देश के कृषि मंत्री के बयान के कारण दूध के दाम बढ़े अथवा दूध के दाम बढ़ानेवालों के इशारे पर कृषि मंत्री ने देश में दूध की कमी होनेवाला बयान दिया, इस सवाल का जवाब भले ही कुछ भी हो, यह तो तय है कि दोनों में कुछ रिश्ता जरूर है.  इस रिश्ते की मार देश का आम आदमी ङोल रहा है. देश में ंउत्पादन बढ़ रहा है, देश में प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ रही है,  लेकिन इसके साथ ही साथ महंगाई भी बढ़ रही है, खास तौर पर उन सब चीजों की महंगाई जो खाने-पीने के काम आती है. अनाज, दालें, चीनी, चाय, दूध, सब्जियां सबके भाव लगातार बढ़ रहे हों और सरकार के दावों के बावजूद यह दाम कहीं घटते नजर नहीं आ रहे. हैरानी की बात यह भी है कि महंगाई बढ़ने का यह क्रम मनमोहन सिंह की पिछली सरकार के कार्यकाल में ही शुरू हो गया था, आम आदमी महंगाई ङोल रहा था, लेकिन आम आदमी का साथ देने के दावों और वादोंवाली सरकार या तो कुछ कर नहीं रही थी या फ़िर कुछ कर नहीं पा रही थी.       
 
 विडंबना यह भी है कि विपक्ष भी इस बारे में कुछ करता नहीं दिखा. न चुनावों के दौरान महंगाई को मुद्दा बनाया गया और न ही चुनावों के बाद इस मुद्दे को उतनी गंभीरता से उठाया गया. जितनी गंभीरता से उठाना जरूरी था. अब जाकर कुछ हलचल होती दिख रही है, लेकिन यह एक सच्चाई  है कि राजनीतिक स्वाथाब की रस्साकशी में महंगाई की मार से त्रस्त आम आदमी इस पीड़ा को भोगने के लिए अभिशप्त लग रहा है. यह भी एक विडंबना ही है कि जो व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहा था, आज उसे देश के कृषि मंत्री के पद से भी हटाने की मांग उठ रही है. पवार की गणना देश के चतुर राजनेताओं में की जाती है और प्रशासकीय हाई से उन्हें सक्षम भी माना जाता है. इसलिए यह तो नहीं माना जा सकता कि दूध के बारे में अथवा पहले चीनी के बारे में दिये गये उनके बयान सिर्फ़ देश को वास्तविकता बताने के लिए थे. पवार स्वयं को स्पष्ट वक्ता भी कहते हैं लेकिन स्पष्टता यदि इतर उद्देश्यों को पूरा करनेवाली हो तो उसे गुण के बजाये किसी रणनीति का हिस्सा ही माना जायेगा. हो सकता है कृषि मंत्री किसी रणनीति के तहत बयानबाजी कर रहे हो, लेकिन यह तय है कि वह रणनीति आम आदमी के हित के लिए तो नहीं है. पवार ने जब चीनी की कमी के बार में बयान दिये थे तो चीनी के दाम बढ़े थे, अब जब उन्होंने दूध की कमी का बयान दिया तो बयान भले ही उत्तर भारत के बारे में हो, इसकी पहली प्रतिक्रिया पवार के गृहराज्य महाराष्ट्र में हई - दूध-उत्पादकों ने भाव बढ़ाने की बात कह दी! तथ्य यह भी है कि चीनी के साथ भी एक गहरा रिश्ता पवार के गृहराज्य का ही है. ऐसे में पवार के बयानों पर उंगलियां उठने का मतलब समझना मुश्किल नहीं होना चाहिए.       
 
सवाल उठता है कृषि मंत्री शरद पवार इस बात को समझ रहे हैं या नहीं? कृषि मंत्री स्थिति की वास्तविकता को समङों और समझायें, यह तो उचित है, जरूरी भी. लेकिन जरूरी यह भी है कि कृषि मंत्री यह भी समझायें कि स्थिति ऐसी क्यों हो गयी और स्थिति को सुधारने के लिए उनकी सरकार क्या कर रही है. आज यदि दूध के संदर्भ में यह सवाल पूछा जा रहा है कि स्थिति अचानक तो नहीं बिगड़ी, ओखर इस दौरान सरकार कर क्या रही थी, तो इसका ईमानदार उत्तर पाने का अधिकार जनता का है. दूध का उत्पादन कम हो रहा था तो दूध के कैसीन बनाने और उसके निर्यात पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया गया? पिछले साल भर में साढ़े चौबीस करोड़ लिटर दूध का कैसीन बनाकर उसका निर्यात किया गया है. क्यों कृषि मंत्री को यह नहीं सूझा कि इस निर्यात से लाभ उठानेवाले तो गिनती के लोग हैं, इससे हई दूध की कमी को देश के करोड़ों-करोड़ों लोग भोगेंगे?        सवाल सिर्फ़ दूध या चीनी की कमी का नहीं है. सवाल सरकार की वरीयताओं का है. आम आदमी की जरूरतें सरकार की या यूं कहें कि हमारी राजनीति की, प्राथमिकता क्यों नहीं बनतीं? दालों के भाव सौ रुपये किलो तक पहंच जायें और कम होने का नाम न लें आलू और प्याज जैसी सब्जियां आम आदमी की पहंच से दूर होती जायें, तो प्रति व्यक्ति आय की बढ़ोतरी की घोषणाओं का क्या अर्थ रह जाता है. प्रति व्यक्ति आय का मतलब देश की औसत आय होता है और इस हिसाब से राजा भोज और गंगू तेली दोनों की आय शामिल है. देश में करोड़पति सांसदों-विधायकों की संख्या लगातार बढ़ रही है, आंकड़े यह भी बताते हैं कि देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन यह तथ्य क्यों भुला दिया जाता है कि देश की दो तिहाई आबादी बीस रुपये रोज पर गुजारा कर रही है? बीस रुपये में आदमी 50 रुपये किलोवाली चीनी, 28 रुपये लीटरवाला दूध, बीस रुपये किलोवाले प्याज, सौ रुपये किलोवाली दाल कैसे और कितनी खरीद सकता है? स्पष्ट है, जिन्हें चिंता होनी चाहिए उन्हें बीस रुपये रोज पर जीवन-यापन करनेवाली देश की 75 करोड़ जनता की चिंता नहीं है. चिंता होती तो देश का कृषि मंत्री दूध की कमी के बजाये दूध का उत्पादन बढ़ाने की बात करता. |