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सिद्धांतहीन राजनीति में भगदड़
हरिवंश | 6/14/2009 7:41:38 AM

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- खबर है कि यशवंत सिन्हा ने भारतीय जनता पार्टी के महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफ़ा दे दिया है.

 

- जसवंत सिंह ने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और आरएसएस की कटु आलोचना की है.

 

- पार्टी में उनके खिलाफ़ कार्रवाई को लेकर मतभेद है.

 

- आरजेडी के महत्वपूर्ण नेता श्याम रजक ने लालू प्रसाद का साथ छोड़ दिया है.

 

- लालू प्रसाद आहत हैं. कह रहे हैं कि वह कल शाम तक साथ रहने की कसमें खा रहे थे. 

 

- लालू प्रसाद के दल से अन्य लोगों के जाने की भी चर्चा है. वह कह रहे हैं, मैं शून्य से शुरुआत करूंगा.  

 

- लालू प्रसाद का एक और महत्वपूर्ण बयान आया है. एमएलए, एमपी फ़ंड खत्म होना चाहिए. इस फ़ंड के लिए कार्यकर्ता झगड़ रहे हैं.

 

हालांकि अलग-अलग दलों की ये घटनाएं हैं, पर इन घटनाओं का मूल कारण या उत्स एक है. राजनीतिक दलों के अंदर अब विचार, मूल्य और प्रतिबद्धता नहीं बची है. दलों के अंदर लोकतंत्र नहीं है. हर दल में साइकोफ़ेंट्स (जी-हजूरी करनेवाले) निर्णायक भूमिका में हैं. हालांकि लालू प्रसाद ने लोकसभा में अन्य संदर्भ में यह शब्द इस्तेमाल किया, टीटीएम(ताबड़तोड़ तेल मालिश), पर यही संस्कृति कमोबेश हर दल में हावी है. दरअसल राजनीतिक दल, दल नहीं रह गये, वे परिवार की ईकाई बन गये हैं. जिस कांग्रेस के वंशवाद के खिलाफ़ राजनीति में समाजवादियों या लालू प्रसाद या रामविलास पासवान का उदय हआ, उन्हें मंथन करना चाहिए कि  कांग्रेस का परिवारवाद अब उन्हें कितना अपनी गिरफ्त में ले चुका है? करुणानिधि की पार्टी परिवार और रिश्तेदारों की पार्टी बन गयी है. डीएमके कोटे से बना हर मंत्री उनका रिश्तेदार, सगा या उनके कुनबे से है.

 

वैसे कांग्रेस में भी इस बार मंत्री बननेवाले अनेक युवा सांसद बड़े नेताओं के पुत्र होने की वजह से ही गद्दी पर बैठे हैं. इसी तरह शरद पवार का दल देखिए. भतीजा, बेटी, सभी महत्वपूर्ण पदों पर. इसी तरह मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद और रामविलास पासवान के दलों में सगों और रिश्तेदारों का ओधपत्य और बोलबाला रहा. भारतीय जनता पार्टी में भी, लालू जी के फ्रेज का इस्तेमाल करें, तो टीएमटी तत्वों का बोलबाला है. चुनाव के ठीक पहले सुधांशु मित्तल को पार्टी में महत्व दिये जाने के प्रसंग पर अरुण जेटली और राजनाथ सिंह का विवाद देश ने देखा. सुधींद्र कुलकर्णी की सही आलोचना को भी पार्टी बरदाश्त करने को तैयार नहीं.

 

यह मत समझिए कि इससे कांग्रेस बरी है. दरअसल भारतीय राजनीति के पतन की संस्कृति का स्र्त तो कांग्रेस ही है. याद करिए, पहली बार 1977 में कांग्रेस हारी. तब ब्रह्मानंद रेड्डी कांग्रेस बनी. देवराज अर्स, जो इंदिराजी के भक्त थे, पार्टी  से अलग हो गये. 1980 में भजनलाल जनता पार्टी के मुख्यमंत्री थे, हरियाणा राज्य में. 1980 के लोकसभा चुनाव में इंदिराजी दोबारा सत्तारूढ़ हईं, तो वह रातोंरात मंत्रिमंडल समेत कांग्रेस में चले गये. बाद में प्रणव मुखर्जी ने राजीव गांधी का साथ छोड़ा. नरसिंह राव के कार्यकाल में नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह अलग हए. 2000 में जब एनडीए  ताकतवर हआ, तो अनेक वरिष्ठ कांग्रेसी दल छोड़ने लगे. वे सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे. नजमा हेपतुल्ला और केसी पंत जैसे लोग कांग्रेस छोड़ गये. कर्नाटक चुनाव के आसपास मारग्रेट अल्वा जैसी नेता भी कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोसने लगीं, क्योंकि उनके बेटे को कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया. वह कांग्रेस से निष्कासित हईं और पुन दोबारा कांग्रेस में शामिल हईं. इसी तरह संजय गांधी के अनेक प्रिय नेता विद्याचरण शुक्ल जैसे महारथी, सत्ता जाते ही उनको छोड़ कर सत्ता पानेवाली पार्टी के चरण पादुका उठाने लगे. यह भी खबर आयी है कि पीए संगमा ने कैसे कांग्रेस छोड़ने के नाम पर जाकर बड़े कांग्रेसी नेताओं से क्षमा मांगी है. उल्लेखनीय है कि उनकी बेटी केंद्र सरकार में सबसे कम उम्र की मंत्री बनी हैं.

 

राजनीतिक दलों के अंदर के परिदृश्य या घटनाएं क्या बताती हैं? पहली चीज, राजनीतिक नेताओं का सत्ता में रहना ही एक मात्र मकसद हो गया है. सत्ता के बगैर बिन पानी मछली की तरह धीरे-धीरे नेता बनते जा रहे हैं. फ़र्ज करिए, कांग्रेस सत्तारूढ़ नहीं हई होती, तो कांग्रेस में यही भगदड़ मचती, जो आज भाजपा, राजद, तेलुगुदेशम पार्टी, समाजवादी पार्टी या लोक जनशक्ति पार्टी में है. जब राजनीति का अर्थ सिर्फ़ सत्ता और कुरसी पाना हो जाये, तब राजनीतिक दलों में ऐसे ही बिखराव व टूट होते हैं. क्या कारण था कि पहले कांग्रेस, जनसंघ, समाजवादी दल या कम्युनिस्टों के बीच अनेक ऐसे बड़े नेता हए, जो पार्टी कार्यकर्ता के रूप में ही रह गये. कभी लोकसभा या विधानसभा का चेहरा नहीं देखा. तब ऐसे लोग विचारधारा के कारण दलों में आते थे. उनका कनविक्सन (दृढ़ मत) विचारों के प्रति होता था, सत्ता या पद के प्रति नहीं. इसलिए कि तप, त्याग और वैचारिक समर्पण का जीवन, वे जीते थे. डॉ लोहिया या जयप्रकाश नारायण जैसे लोग किस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं? ये तो बड़े नेता थे. मामूली कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता भी पार्टी के विचारों के प्रति होती थी. व्यक्ति निष्ठा या नेता की गणेश परिक्रमा में ये कार्यकर्ता नहीं रहते थे. तब दलों का वार्षिक अधिवेशन होता था. कार्यकर्ता-नेता एक साथ रहते थे. पार्टी के वार्षिक अधिवेशन में हर गंभीर मुद्दे पर पार्टी के अंदर बहस होती थी. नेता की इच्छा के अनुसार पार्टी की नीतियां नहीं बनती थीं. पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र और बहमत के आधार पर फ़ैसले होते थे. नीतियां तय होती थीं. और हर दल में नेताओं के विकसित होने का, बढ़ने का माहौल होता था. साधारण कार्यकर्ता भी अपनी प्रतिबद्धता, श्रम और ईमानदारी से शीर्ष पर पहंच सकता था. अब ये चीजें दलों में है ही नहीं. क्या विडंबना है कि ये दल देश में तो लोकतंत्र चलाने का ठेका लेते हैं, पर अपने दलों के अंदर लोकतांत्रिक पद्धति नहीं अपनाते? ऐसी स्थिति में सत्ता जाते ही, दलों के अंदर पलायन, टूट और विरोध के स्वर स्वाभाविक परिणति है. लालू प्रसाद ने सही कहा है कि अब एमपी और एमएलए विकास फ़ंडों को हटाया जाना चाहिए. सच यह है कि कमीशन और कमाई के स्र्ोत के रूप में दलों के कार्यकर्ता इस विशेष फ़ंड को देखते हैं. जिस दल में अब इस फ़ंड को पाने की स्थिति (एमएलए, एमपी बनाने) तक पहुंचाने की क्षमता घटती दिखाई दे रही है, ऐसे सूखते तालाब (राजनीतिक दल) से राजनीतिक पक्षी उड़ रहे  हैं. उन्हें जहां भी हरा-भरा दिखता है, यानी जो भी दल उन्हें सत्ता के करीब पहंचता दिखाई देता है, उसके पास वे पहंच जाते हैं. इसलिए घोर वामपंथ से घोर दक्षिणपंथ की यह यात्रा ये नेता बेशर्म व बेहिचक कर रहे हैं.

 

भारतीय लोकतंत्र के लिए ऐसी राजनीतिक  घटनाएं गंभीर चेतावनी हैं. एक तरफ़ बड़े पैमाने पर मतदाताओं की बढ़ती उदासीनता यानी वोट देनेवालों की घटती संख्या. दूसरी ओर राजनीतिक दलों के अंदर अंदरूनी लोकतंत्र का न होना, वैचारिक अराजकता, स्वअनुशासन का अभाव, नैतिक आग्रह का न होना, लोकतंत्र की जड़ों को लगातार कमजोर करेगा. जब बड़े-बड़े नेता छोटे-छोटे लाभ के लिए बेचैन दिखाई देते हैं, तब वे क्या आदर्श या प्रभाव कार्यकर्ताओं पर छोड़ पाते हैं? अगर नेताओं के साथ सत्ता है, तो कार्यकर्ता झुकते हैं. सत्ता के भय से या सत्ता में हिस्सेदारी मिलने के लोभ में. जब बड़े नेताओं के हाथ से सत्ता चली जाती है, तो कार्यकर्ता देखते हैं कि इनसे कोई लोभ-लाभ सधनेवाला नहीं, तो वे उनको छोड़ कर कहीं और निकल जाते हैं. अगर इन बड़े नेताओं का नैतिक असर होता, वैचारिक असर होता, तो शायद उनके इर्द-गिर्द ऐसे ही कार्यकर्ता जुटते, जो उन्हें संकट आने पर नहीं छोड़ते. यह युग सत्ता का है. पैसे का है. लोभ का है. लालच का है. यह माहौल इन्हीं बड़े नेताओं ने या राजनीतिक दलों ने बनाया है. इसलिए समय-समय पर ये दल या नेता, इसके कुपरिणाम भुगतने को भी अभिशप्त हैं.

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