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सत्ता, पद, पैसा विपक्ष = रोदन,छाती पीटना, फ़ूटना
6/21/2009 10:34:32 AM

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यह लोकसभा चुनाव के बाद का परिदृश्य है, यानी राजनीति का अर्थ हो गया है, सत्ता, कुरसी, पावर का ग्लैमर. सत्तारूढ़ पार्टी में होकर भी जिसे गद्दी नसीब नहीं, वह मानता है कि वह शून्य है. गंगा में होकर भी गंगा नहाने का पुण्य नहीं. उधर विपक्ष की नयी परिभाषा हो गयी है, लुटे-पिटे लोग. अरण्य रोदन और विधवा विलाप में मगन. सार्वजनिक रूप से छाती पीटनेवाले. खींझ कर अपने ही दल में टूट-फ़ूट आमंत्रित करनेवाले. जब सत्ता में रहे, साथ-साथ रहे. तब एक दूसरे की प्रशंसा गीत गाते नहीं अघाते थे. चारणों की तरह अपने नेता को पूजते थे, जिन्हें अब सार्वजनिक रूप से कोस रहे हैं. इन सबका एक ही मूल कारण है, सत्ता न पाना.        यह है, आज की भारतीय राजनीति की तसवीर. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि खासतौर से विपक्ष की राजनीति में कोई आचार्य कृपलानी, लोहिया, मधु लिमये, राजनारायण, रामसेवक यादव, किशन पटनायक, समर गुहा, जार्ज फ़र्नाडीस या श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बलराज मधोक, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, प्रकाशवीर शास्त्री या ज्योतिर्मय बसु, एके गोपालन, प्रो हीरेन मुखर्जी वगैरह पैदा हो सकते हैं? याद रखिए, ये सभी विपक्ष में रहे. कोई सत्ता में गया, तो अंत में. वह भी चंद दिनों के लिए. कई बार लोकसभा में दो-एक की संख्या में ये रहे या अकेले रहे या उपचुनाव जीत कर अकेले आये. इनमें से अनेक को लोकसभा के पूरा कालखंड ( पांच वर्ष) का समय भी किसी-किसी को नहीं मिला, क्योंकि उपचुनाव जीते थे. पर उन्होंने अपनी भूमिका से सत्ता पक्ष को छोटा बना दिया. समाज में विपक्ष के साथ होना फ़ैशन जैसा हो गया. जेपी को छोड़ दें. वह तो कभी चुनाव ही नहीं लड़े. पर इनमें से अधिकतर लगातार 30-40 वषाब तक या कुछेक तो आजीवन विपक्ष की ही राजनीति करते रहे. उन्होंने अपनी भूमिका से विपक्ष की राजनीति को गरिमा दी. नयी ऊंचाई दी. विपक्ष का ऐसा नेता बनना तब ज्यादा सम्मानजनक था, मंत्री रहने के बजाय. अनेक ऐसे सांसद-विधायक हुए ( जिनके नाम यहां उल्लेख नहीं हैं), जिन्होंने बदलाव की राजनीति को कैरियर बनाया. क्या इस लोकसभा में विपक्ष के पास एक भी ऐसा चेहरा या छवि है, जो कारगर विपक्ष की भूमिका के लिए तैयार हो? एक उपचुनाव जीत कर लोहिया संसद पहुंचे. कहीं से दीनदयाल उपाध्याय पहुंचे. कहीं से आचार्य कृपलानी और पूरे देश की राजनीति का दृश्य बदल दिया. लोहिया अपनी बहसों और प्रखरता से संसदीय इतिहास में मानक बन गये. जीते जी. संसदीय विपक्ष का गौरव, सत्ता पक्ष से बड़ा हो गया. बिहार के ही एक उपचुनाव से मधु लिमये चुनाव जीत कर गये.            

 

  पूरी लोकसभा उनकी बहस, तेजस्विता से प्रभावित हई. इंदिराजी जैसी नेता ने कांग्रेसी सांसदों से कहा कि मधु लिमये से बहस सीखें. वह तरसती थीं कि कांग्रेस की भीड़ में एक मधु लिमये नहीं. बाद के दिनों में भाजपा लोकसभा में महज दो सीटों पर सिमट गयी. तब भी भाजपा का मनोबल ऐसा नहीं टूटा था. आज 116 सांसदोंवाली पार्टी (भाजपा), जो चाहे तो विपक्ष का एक नया इतिहास बना सकती है, छाती पीट रही है. रो रही है. आपस में फ़ूट रही है. यही हाल है टीडीपी का. जयललिता, मायावती, भाकपा, माकपा (तीसरा मोरचा), सब स्तब्ध हैं. किंकर्तव्यमूढ़. कुछ सूझ नहीं रहा, क्या करें? भाकपा के महासचिव एबी वर्धन अब फ़रमा रहे हैं कि कांग्रेस के न्यूक्लीयर डील का विरोध शायद गलत था. माकपा को भी रास्ता नहीं सूझ रहा कि वह कहां और कैसे कदम ब़ढ़ाये?        यानी एनडीए खेमा या तीसरा मोरचा मान बैठा था कि अगली सरकार उनकी है. इस बार का चुनाव इस संदर्भ में अनोखा था कि तीनों बड़े खेमे यूपीए, एनडीए, तीसरा मोरचा, सत्ता के प्रति ही आश्वस्त थे. खासकर भाजपा मान बैठी थी कि सत्ता तो मिल चुकी है. चुनाव महज फ़ॉरमेलटी (औपचारिकता) भर है. बस शपथ लेना बाकी है. इसी मानसिक स्थिति में तीसरा मोरचा था. अब, जब सत्ता नहीं मिली, तो छाती पीट रहे हैं. टूट रहे हैं. अपने बाल नोंच रहे हैं. एक दूसरे की थूकम-फ़जीहत में लगे हैं. पहले के अपने साथियों, सहकर्मियों की ही धोती खोल रहे हैं. क्या देश चलानेवालों का यह चरित्र होना चाहिए? क्या देश में मुद्दों की कमी है? क्यों राजनीति में होने का अर्थ हो गया है, किसी तरह सत्ता पाना, गद्दी पाना, पावर का ग्लैमर भोगना? दरअसल राजनीति मुद्दों से, विचारों से, प्रतिबद्धता से भटक गयी है. तप,त्याग, चरित्र और प्रतिबद्धता से उसका सरोकार टूट गया है. फ़र्ज करिए कि जब ‘50, ‘60 - ‘70 के दशकों में लोकसभा में विपक्षी सदस्यों की संख्या मुट्ठी भर नहीं होती थी. 1967 के बाद अधिकतम सीट किसी को मिली, तो वह पचास के नीचे ही थी. तब किसी एक पार्टी को 5-7 सीटें मिल जाना, बड़ी बात होती थी. आज भाजपा, जनता दल, टीडीपी, जयललिता, मायावती, तीसरे मोरचे को विपक्ष की धारदार राजनीति करने के लिए बहुत सीटें मिलीं हैं. भाजपा को तो 116 सीटें मिलीं हैं. फ़िर भी सब असहाय दिख रहे हैं? क्या देश में मुद्दों की कमी है?         आज देश में मुद्दों की बाढ़ है. आज देश अधिक मुद्दों और चुनौतियों से घिरा है. लालगढ़ प्रसंग नयी चुनौती है. नक्सलियों पर सेना को फ़तह करना पड़ रहा है. अंदरूनी संकट में सेना का इस्तेमाल! कहां पहुंच गये हैं हम! यह लोकतंत्र कामयाब है कि नहीं? हमारी चुनौतियों का समाधान, यह लोकतंत्र या यह व्यवस्था कर पा रहे हैं या नहीं? पिछली यूपीए सरकार में ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तीन बार ऑन रिकार्ड कहा, आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनौती नक्सली हैं. पर वह सरकार, कोई समाधान नहीं निकाल पायी. क्या यह प्रधानमंत्री की विफ़लता थी या व्यवस्था की विफ़लता? इसका उत्तर लोकतंत्र ढ़ंढ़ेगा कि नहीं? विपक्ष से बेहतर सरकार को समाधान के लिए कौन बाध्य कर सकता है. एक ईमानदार विपक्ष की भूमिका सत्ता के ताकतवर चारणों से बहुत ऊंची है. मनमोहन सिंह निजी तौर पर अत्यंत ईमानदार इंसान हैं. पर प्रधानमंत्री की कुरसी पर बैठा यह इंसान नक्सली समस्या के बारे में ऐसा बयान दे और कुछ करा न पाये, तो क्या निष्कर्ष है? एक आम आदमी का असहाय होना = एक प्रधानमंत्री का असहाय होना? दोनों समान हैं? आज देश में यही स्थिति है. अंतत इसका समाधान ढ़ंढ़ने का दायित्व किसका है? इसी तरह विपक्ष के लिए असंख्य मुद्दे हैं. राज्यसभा में अरुण जेटली ने बड़ा प्रभावी भाषण दिया कि विपक्ष की क्या भूमिका होगी? उन्होंने कारगर विपक्ष की शायद तीन भूमिका गिनायी - सही मुद्दों पर सरकार से सहयोग, गलत मुद्दों पर तीव्र संघर्ष, राष्ट्रहित पर एक आवाज. क्या यह भूमिका महज भाषण के लिए है या व्यवहार में भी धरातल पर उतरना चाहिए? चुनावों में भ्रष्टाचार के मुद्दे बार-बार उठे. पक्ष और विपक्ष दोनों मानते रहे हैं कि आज भारत में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती है. कांग्रेसी तो दुहाई देते रहे हैं कि राजीव गांधी ने 1984 में ( कांग्रेस अधिवेशन, मुंबई) कहा था कि दिल्ली से चला एक रुपया गांवों तक 14-15 पैसों के रूप में पहुंचता है. आज हालात है कि 4-5 पैसे भी नहीं पहंचते. भ्रष्टाचार का दूसरा प्रसंग उठा कि स्विस बैंक में काला भारतीय धन जमा है. इसे भाजपा ने बड़े जोरदार तरीके से उठाया. जदयू ने हमलावर तरीके से इस मुद्दे को सामने रखा. कांग्रेस ने भी जवाब दिया. क्या ये मुद्दे गायब हो गये हैं? आज की राजनीति में चाहे दल कोई भी हो, बिचौलियों की, दलालोंे की, लाबिस्टों की भूमिका निर्णायक हो गयी है. क्या इनसे मुक्ति का अभियान दल नहीं चला सकते? याद रखिए, गवनबस के सवाल पर देश की अंदरूनी स्थिति बहत खराब है. यूपीए ने प्रशासनिक सुधार आयोग बनाया था. वीरप्पा मोइली इसके चेयरमैन थे. इसकी भी रिपोर्ट आ चुकी है. पुलिस सुधार का मामला अलग है. न्यायायिक सुधार के मामले अलग हैं.. अनेक मुद्दे हैं, जो देश का भविष्य तय करनेवाले हैं. पर विपक्ष के पास कोई एजेंडा दिखाई नहीं देता. क्या विपक्ष शालीनता से सौ दिनों प्रतीक्षा कर कांग्रेस को यह मौका नहीं दे सकता कि वह अपने किये वायदों को पूरा करे? मुद्दे अधूरे रहने पर विपक्ष को नैतिक हक होगा कारगर विरोध का. क्या यह रणनीति नहीं बन सकती?        कांग्रेस के सौ दिनों में किये गये वायदे पूरे नहीं होनेवाले. क्यों?        यह कोई भविष्यवाणी नहीं है. सिर्फ़ एक आकलन है. 1962 से हम लगातार देख रहे हैं कि किसी भी केंद्र सरकार को कितना ही बहमत देकर चुनिए, अधिकतम ढाई-तीन साल में वह अपनी प्रामाणिकता खो देती है. राज चलाना उसके लिए कठिन हो जाता है. जिन भी सरकारों को हम बहुमत से ऊर्जा देते है, वे कर्म से लड़खड़ाने लगती हैं.1962 में देश ने भारी बहुमत से कांग्रेस को जिताया. पंडित नेहरू की एक आभा थी. आजादी के लड़ाई के Þोष्ठ मूल्यों के वे प्रतििबब थे. 15 साल तक भारत पर राज कर चुके थे. पर चीन विवाद ने उनकी छवि धूमिल कर दी थी. पर उस तीसरे चुनाव में भी वह चुनौती से परे थे. 1957 से अधिक बहमत कांग्रेस को मिला. अूबर ‘62 में चीन ने हमला किया. महज दस महीने में कांग्रेस को मिला बहमत लगभग निरस्त हो गया. चीनी हमले के बाद कांग्रेस की प्रामाणिकता और शासन क्षमता पर प्रश्न चि: लगने लगे. एक तरफ़ विदेशी पराजय, दूसरी ओर कांग्रेस के अंदर गद्दी पर बैठे पुराने लोग, जिनकी इज्जत घट रही थी, इसे ठीक करने के लिए नेहरूजी ने 1963 में कामराज योजना लागू की. पार्टी को फ़िर जीवंत बनाने के लिए उन्होंने अनेक मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को कांग्रेस से विदा कर दिया. बाहर जानेवालों में कुछ भ्रष्ट थे. कुछ बदनाम थे. कुछ नेहरू के प्रतिस्पर्धी थे. दो-एक ऐसे भी थे, जो शरीफ़ और ईमानदार थे. यशवंत सिन्हा चाहते हैं कि भाजपा में कामराज प्लान लागू हो. नेहरू के बाद, लाल बहादुर शास्त्री आये. फ़िर इंदिरा गांधी. इसी दौरान अकाल, कश्मीर में मुजाहिद, पाकिस्तान युद्ध, दो प्रधानमंत्रियों की मौत, सब कुछ हए. दिल्ली कमजोर लगी. उधर कई राज्यों में िहसा-आंदोलन और अराजकता का माहौल बना. 1967 में जब चुनाव हए, तब सारा परिदृश्य ही बदल गया. फ़िर 1971 में इंदिराजी को गरीबी हटाओ और बांग्लादेश विजय ने नयी ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया. कांग्रेस के गर्भ से इंदिरा कांग्रेस युवा और जीवंत होकर निकली. पर 1974 आते-आते बिहार आंदोलन, रेल हड़ताल, छात्र आंदोलन ने नयी चुनौतियां खड़ी की. देश में वही अराजकता दिखाई देने लगी. 1967 से ’71 तक आयाराम-गयाराम के दिनों में अराजकता देश के कोने-कोने में दिखाई दी. 1971 में वोटर ने जो सत्ता और अधिकार इंदिरा गांधी को दिया, वह दोनों वह बचा कर नहीं रख सकी.1977 में जनता पार्टी ने दो-तिहाई बहमत जीत कर सरकार बनायी. पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से हटी. पर क्या हआ? सारे लोग सत्ता पाकर अपने आप को दिल्ली की गद्दी का अधिकारी समझने लगे. आपस में झगड़ने लगे. 28 महीने के अंदर ही जनता पार्टी टूट गयी. 1980 में इंदिराजी को फ़िर जनता ने सिर पर बिठाया. भारी समर्थन दिया. ढाई-तीन साल बाद ही देश, फ़िर संकट में पहंच गया. इसी बीच इंदिराजी की हत्या हई. राजीव गांधी को अभूतपूर्व समर्थन मिला. द्वितीयोनास्ति की स्थिति. वोटर ने जो सत्ता, इंदिराजी और जवाहरलालजी को नहीं दी थी, वह राजीव गांधी को दी. पर ढाई-तीन वषाब में ही बोफ़ोर्स और भ्रष्टाचार के भूत खड़े हो गये. सरकार लंगड़ी हो गयी. 1990 से 2004 के बीच के दृश्य तो और अधिक अस्थिरता के हैं. देश में हर दो-ढाई साल पर ऐसे ही संकट उभरते रहे.  2004 में यूपीए सत्तारूढ़ हई. दो-ढाई वषाब बाद ही लेफ्ट की बार-बार धमकी ने केंद्र सरकार को असहाय और लाचार स्थिति में पहुंचा दिया. जनता ने खीझ कर इस बार अनेक वर्षो बाद कांग्रेस को वह ताकत दी है, जो पिछले 15-18 वषाब में नहीं थी.        पुराने अनुभव तो यही बताते हैं कि सरकार बनने के दो-ढाई साल बाद ही सरकारें नयी चुनौतियों के आगे लड़खड़ाने लगतीं हैं.        हम सामूहिक कामना करते हैं कि यह स्थिति कांग्रेस के लिए न आये. लेकिन इस तरह के बार-बार संकट, भारतीय राजनीति के लिए शाप की तरह है. वह बार-बार आता है. इसके लिए किसी राजनीतिक पार्टी को दोष देना व्यर्थ है. यह पूरी राजनीति के संकट का परिणाम है. व्यवस्था की विफ़लता का प्रमाण है. शाप इसलिए है कि राजनीतिक दलों में नये विचारों की गरीबी है. साहस और विजन की गरीबी. मौलिकता की गरीबी है. नये प्रयोग के लिए नयी दृष्टि की गरीबी है. यही अवसर है जब कोई ईमानदार विपक्ष एक नये एजेंडा के साथ राजनीति में नयी उम्मीद जगा सकता है. देश के लिए ऐसा विपक्ष बनना सरकार चलाने से भी कठिन और दायित्वों से भरा है. क्या दो सौ से अधिक विपक्षी सदस्यों वाली लोकसभा में हम एक सार्थक विपक्ष भी नहीं बना सकते? इसके बाद भी हम अपने लोकतंत्र को संपूर्ण मानेंगे?

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