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अमेरिकी वर्चस्व खतरे में है !
सत्येंद्र रंजन | 6/24/2009 7:42:18 PM

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दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व को एक बड़ी चेतावनी पिछले हफ्ते रूस के शहर येकातेरिनबर्ग से मिली. भारतीय मीडिया में इस शहर की ज्यादातर चर्चा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ओसफ़ अली जरदारी की मुलाकात के सिलसिले में ही हुई. लेकिन ये दोनों नेता जिन सम्मेलनों के लिए वहां पहुंचे थे, उनसे उभरे संकेत पिछले करीब आधे दशक से मजबूत होती इस धारणा की एक बार फ़िर पुष्टि कर गये कि कम से कम ओर्थक मामलों में अमेरिकी दबदबे के खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है. यह धारणा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में डॉलर की हैसियत गिरने के साथ बननी शुरू हुई थी, लेकिन जितने खुले और साफ़ शब्दों में डॉलर की इस हैसियत को येकातेरिनबर्ग में चुनौती मिली, उतना पहले शायद कभी नहीं हुआ था.       

 

गौरतलब है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी और ब्रेटन-वुड्स नाम से जानी जाने वाली नयी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के तहत डॉलर अंतरराष्ट्रीय कारोबार की मुद्रा बन कर उभरा. दुनिया भर के देशों के लिए ओर्थक सुरक्षा और वित्तीय मजबूती के लिए अपने पास डॉलर रखना जरूरी होता गया. डॉलर रखने की होड़ की वजह से दुनिया भर से वित्त का अमेरिकी खजाने में निवेश होता रहा. परिणाम यह हुआ कि घाटे में चलने के बावजूद अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था मजबूत दिखती रही. चीन जैसे देश ने सैकड़ों अरब डॉलर के अमेरिकी बांड्स खरीद लिये और ओर्थक दुनिया में यह कहावत चर्चित रही कि चीन जैसे देश वहां अपना पैसा जमा कर अमेरिकी घाटे को पाट रहे हैं.        एक समय दुनिया का 85 फ़ीसदी से भी ज्यादा कारोबार डॉलर में होता था. अब 65फ़ीसदी से कुछ ज्यादा है. दरअसल, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बढ़ते घाटे, कारखाना उद्योग में उसके पिछड़ने, घटती बचत दर ओद से डॉलर की हैसियत पर सवाल खड़े होने लगे. 1990 के दशक में यूरो के एक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा के रूप में उभरने के साथ डॉलर की वैकल्पिक मुद्रा के उपलब्ध होने की चर्चा शुरू हो गयी. बहुत से जानकार मानते हैं कि इराक पर अमेरिकी हमले की एक प्रमुख वजह यह थी कि सद्दाम हुसैन ने तेल का अपना सारा कारोबार यूरो में करने का फ़ैसला किया था. उधर लैटिन अमेरिका में वामपंथ की आयी लहर के साथ विभिन्न देशों में डॉलर के अलावा दूसरी मुद्राओं में कारोबार करने का चलन बढ़ा. वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज इस परिघटना के नेता के तौर पर उभरे. सितंबर2008 में अमेरिका में आयी ओर्थक मंदी ने इस प्रक्रिया को नयी गति दे दी. रूस और चीन ने इस मंदी से निपटने के लिए हुई जी-20 की बैठक के समय ही यह मांग उठाई कि अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए एक नई मुद्रा बनायी जानी चाहिए. ब्राजील भी इस मांग में उनके साथ रहा है. और येकातेरिनबर्ग में जब ये देश भारत के साथ ‘ब्रिक’ (ब्राजील, इंडिया, रूस, चीन) शिखर सम्मेलन के लिए इकट्ठे हुए तो वहां डॉलर का विकल्प तैयार करने का मुद्दा एजेंडे में काफ़ी ऊपर रहा. लेकिन भारत के ज्यादा उत्साह नहीं दिखाने या कहें सतर्क रुख अपनाने की वजह से शिखर सम्मेलन के बाद जारी साझा बयान में यह बात खुल कर नहीं कही गई. साझा बयान में सिर्फ़ ‘अधिक विभिन्नतापूर्ण अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था’ के लिए काम करने की जरूरत बतायी गई. दरअसल, भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कोई ऐसी बात कहने या करने से बचता रहा है, जो अमेरिका को नागवार गुजरे. मनमोहन सिंह सरकार की विदेश नीति में अमेरिका से दीर्घकालिक रणनीतिक रिश्ता बाकी सभी संबंधों से ज्यादा महत्तवपूर्ण रहा है. जॉर्ज बुश के जमाने में मनमोहन सिंह शंघाई सहयोग संगठन की बैठकों में हिस्सा लेने से बचते रहे. ब्रिक या इबसा (भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका) जैसे मंचों पर भी उनकी कोशिश रही कि इन नये उभरते गंठबंधनों से अमेरिका-विरोध का संकेत न मिले. इसके बावजूद अब ऐसे मंचों पर उन मुद्दों पर खुलकर चर्चा होने लगी है, जो सीधे एक-ध्रुवीय विश्व के अमेरिकी इरादे को चुनौती देते हैं.येकातेरिनबर्ग में ब्रिक के साझा बयान में ‘अधिक लोकतांत्रिक और न्यायपूर्ण बहु-ध्रुवीय दुनिया’ बनाने का इरादा जताया गया. तो शंघाई सहयोग संगठन ने अधिक न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था बनाने का इरादा जताने के साथ-साथ ऐलान किया कि ‘बहु-ध्रुवीय दुनिया का निर्माण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसे अब पलटा नहीं जा सकता.’ ब्रिक सम्मेलन शुरू होने से ठीक पहले एक ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनेसियो लूला द सिल्वा ने एक लेख में विश्व व्यवस्था पर धनी देशों के वर्चस्व को खुली चुनौती देते हुए लिखा कि अब ‘राजनीतिक का समय’ गया है. उन्होंने पूछा- क्या धनी देश अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी और नियंत्रण को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, ताकि भविष्य में ओर्थक मंदी को रोका जा सके?       

 

लेकिन बात सिर्फ़ बातों तक ही सीमित नहीं है. शंघाई सहयोग संगठन की बैठक खत्म होने एक ही दिन बाद रूस और चीन ने घोषणा कर दी कि वे अब तेल का आपसी कारोबार अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में करेंगे. दोनों देशों के बीच यह कारोबार करीब 100अरब डॉलर तक पहुंचने वाला है. अर्थशास्त्रियों की राय है कि रूबल और युआन में इन दोनों के भुगतान करने का सीधा असर डॉलर की कीमत पर पड़ सकता है. यह इस बात का भी संकेत है कि ओखरकार चीन धीरे-धीरे डॉलर के विकल्प की तलाश के रास्ते पर निकल पड़ रहा है. गुजरे वषाब के दौरान यह कहा जाता रहा है कि चूंकि चीन का डॉलर में भारी निवेश है और अमेरिका उसके निर्यात का बहुत बड़ा बाजार है, इसलिए वह डॉलर की लुटिया नहीं डुबोना चाहता. लेकिन लगता है कि चीन ने अंतरराष्ट्रीय कारोबार के नये माध्यमों की तलाश की ओर्थक और राजनीतिक जरूरत को समझ लिया है.       

 

दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व के दो सबसे बड़े पहलू हैं- डॉलर और हथियार. हथियारों का अमेरिका आज भी सबसे बड़ा व्यापारी है. लेकिन उसकी यह हैसियत एक हद तक एक-ध्रुवीय दुनिया के कायम रहने से जुड़ी हुई है. बहु-ध्रुवीय दुनिया कायम होने से उसकी इस हैसियत को भी चुनौती मिल सकती है. सोवियत गुट अमेरिका का प्रतिस्पर्धी जरूर था, लेकिन उस गुट के बाहर अमेरिका की हैसियत को कोई चुनौती नहीं थी. निर्गुट आंदोलन ने अमेरिकी दादागीरी पर सवाल जरूर उठाये, लेकिन वह विकल्प उभारने की कोई ठोस पहल नहीं कर पाया. बहरहाल, जो काम वे नहीं कर पाये, उसके अब ब्रिक, इबसा, शंघाई सहयोग संगठन और लैटिन अमेरिकी देशों के गंठबंधनों के जरिये होने की यथार्थवादी संभावना बन रही है. दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व खतरे में है!

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

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