खबरें बड़ी, असर दूरगामी! पर अचर्चित

।।हरिवंश।।
आधुनिक बच्चों में भाषा का संस्कार विकसित नहीं हो रहा है. कंप्यूटर और एसएमएस ने एक नयी शब्दावली गढ़ दी है. बच्चे अपने नये विचारों के लिए नये कोडवर्ड लगातार विकसित कर रहे हैं. घर के अभिभावक तो इन शब्दों को समझ भी नहीं पाते. टेक्नोलॉजी में महारत हासिल कर चुके और टीवी की दुनिया में डूबे युवाओं-बच्चों की पीढ़ी ने एक नया शब्द भंडार बना लिया है. इस शब्द भंडार का भाषा विज्ञान से कोई सरोकार नहीं है. संवेदना, मनोविज्ञान और भाव से भी नहीं. ये शुद्ध लेन-देन, कामकाज की नीरस भाषा है. समाजशास्त्री इसका असर बाद में देखेंगे. पर पहला असर तो दिखता है कि इसने साहित्य (उपन्यास, गद्य, कविता, कहानी वगैरह) से लोगों को दूर कर दिया है.

इस स्तंभ में देश-विदेश से जुड़ी कुछेक खबरों की चर्चा है, जिन्हें भारतीय मीडिया या अखबारों में कम जगह मिली. पर इन तथ्यों का दूर तक असर होनेवाला है. भारतीय जीवन, समाज और देश पर.

-सोना : चीन नंबर वन-
सोना अजीब चीज है. भारत जैसे गरीब मुल्क में, दुनिया के मुकाबले सबसे अधिक सोने की खपत थी. भारत, कभी सोने की चिड़िया रहा होगा. पर दुनिया के विकसित देशों के मुकाबले भारत गरीब मुल्क है. पर यहां सोने की सबसे अधिक खपत थी. शायद सोने का संबंध आर्थिक सुरक्षा से हो. यह रीति-रिवाज भी से जुड़ा है. दक्षिण में सोने का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है. गरीब या धनी सब करते हैं. संकट या कठिन दिनों में, सोने में ही सुरक्षा तलाशने का मानस रहा है. 1991 में भारत जब कंगाल होने की स्थिति में पहुंंच गया, तो भारत को अपना सोना गिरवी रख कर अपनी साख बचानी पड़ी थी. अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह मामूली निर्णय नहीं था. क्योंकि देश 1991 के पांच-सात वर्ष पहले से ही कंगाली के किनारे था. पर, किसी प्रधानमंत्री ने इसे बचाने का साहस नहीं किया.

मुल्क को आर्थिक कंगाल बनाने का काम भी इसी दौर की सरकारों ने किया था. इस साहसिक निर्णय की कीमत क्या होगी? यह तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को पता था. तब उन्होंने कहा, देश की साख लुट जायेगी, तो सोना रख कर क्या होगा? सोना गिरवी रख कर हम कर्ज लेंगे. विदेशी बाजार में अपनी साख बचायेंगे. कमा कर इसे छुड़ायेंगे. उन्होंने कहा, गांव की महिलाएं सोना सुहाग के लिए रखती हैं. दुर्दिन में बंधक रख कर आर्थिक कठिनाइयों से परिवार को उबारने के लिए भी. हम फ़िर समृद्ध बनेंगे. वही हुआ. सोना गिरवी रखने के साहसिक निर्णय ने भारत की किस्मत पलट दी. पर चंद्रशेखर को इसकी कीमत चुकानी पड़ी. राजनीतिक तौर पर.इस तरह भारत, दुनिया में सोने का सबसे बड़ा क्रेता रहा है. पर वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, 2012 में भारत को पीछे छोड़ कर साम्यवादी चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोने का उपभोग करनेवाला (भोक्ता) देश होगा. उल्लेखनीय है, चीन दुनिया का सबसे बड़ा सोना उत्पादक देश भी है. चीन में 2011 में सोने की मांग बीस फ़ीसदी बढ़ी. कुल 769.8 मीट्रिक टन. पर भारत में सात फ़ीसदी मांग घटी है. इसी अवधि में.

इस तरह विशेषज्ञों का अनुमान है कि पहली बार 2012 में सबसे बड़ा सोने का भोक्ता देश, चीन बनेगा. भारत को पछाड़ कर. अगर ताजा तिमाही को ही आधार मान लें, तो चीन, भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल चुका है. चीन ने गुजरे तिमाही में 199.9 टन सोने की खरीद की. इसी अवधि में भारत ने 173 टन सोने की खरीद की.सोना जैसे परिवार या इंसान को मानसिक सुरक्षा देता है, उसी तरह मुल्क को भी देता है. चीन अब महाशक्ति है. अमेरिका को पीछे छोड़ता देश. आर्थिक महाशक्ति. सैन्य महाशक्‍ति की हैसियत में पहुंचता देश. अब सोने का सबसे बड़ा भोक्ता देश भी. साफ़ है कि महाशक्ति और महासमृद्ध देश बनने के जो-जो मापदंड हो सकते हैं, उसमें चीन, भारत समेत दुनिया को पीछे छोड़ रहा है. क्या कभी भारतीय राजनीति में ऐसे सवाल गूंजते हैं? या उठते हैं? पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं. क्या राजनीति में ऐसे मुद्दे उठे हैं कि हमारी स्थिति ऐसी क्यों है? हममें क्या कमी है? हमारी व्यवस्था में क्या त्रुटि है? हमारा गवर्नेस क्यों इतना खराब है? हमारे यहां क्यों इतना भ्रष्टाचार है?

-रक्षा मंत्रालय : नक्सली-आइएसआइ संबंध-
एक राष्ट्रीय अंगरेजी अखबार की (26.02.12) खबर है. इस सूचना के अनुसार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (माओवादी) का संबंध पाकिस्तान की खुफ़िया सेवा इंटरनेशनल सर्विसेस इंटेलीजेंस (आइएसआइ) से है. यह रिपोर्ट सेंटर फ़ार लैंडवार फ़ेयर स्टडीज (क्लाफ़स) ने तैयार की है. रक्षा मंत्रालय ने इसे अध्ययन का काम सौंपा था. इस अध्ययन के अनुसार आइएसआइ ने भारतीय माओवादियों का संबंध, पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों लश्कर-ए-तोयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-जिहाद अल-इसलामी से कराया है. भारत में इंडियन मुजाहिदीन और सिमी (स्टूडेंट इसलामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया) से भी नक्सलियों का तालमेल कराया है. इस अध्ययन के अनुसार आइएसआइ के‘कराची प्रोजेक्ट’का मकसद है, भारत को आर्थिक और सैनिक रूप से तबाह करना. इसी लक्ष्य के तहत आइएसआइ ने माओवादियों और भारत विरोधी आतंकवादी गिरोहों के बीच तालमेल कराया है. इससे पहले सरकारी स्‍त्रोतों से बांग्लादेश के उग्रवादियों, बर्मा और उत्तर-पूर्व के आतंकवादियों तथा भारत से मुक्ति चाहनेवाले तत्वों से भी नक्सलियों के जुड़े होने की खबरें आती रही हैं. कश्मीर के आतंकवादियों से मिल कर काम करने से संबंधित तथ्य भी चर्चित रहे. चीन के भरपूर सहयोग की चर्चा अलग है.इन सूचनाओं की तह में जाना एक सामान्य नागरिक के लिए कठिन है. पर रक्षा मंत्रालय या गृह मंत्रालय या सरकार के ओधकरिक प्रवक्ताओं के स्‍त्रोतों से जब ऐसी खबरें आती हैं, तो इनसे बड़े सवाल खड़े होते हैं. दुनिया में कम्युनिस्टों ने जिन भी देशों में क्रांति की. वे देश भक्त भी रहे, फ़िर अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व की बात की. जो भारत को तोड़ना चाहते हैं या खंडित करना चाहते हैं, ऐसी ताकतों से नक्सलियों के सांठ-गांठ के ओधकारिक बयान पर नक्सलियों का पक्ष स्पष्ट होना जरूरी है. उनके हित में.

-खत्म होती भाषा-
तकनीक ने दुनिया को कहां पहुंचा दिया है? भोग की दुनिया में डूबे लोग अब इस धरती को स्वर्ग मानने लगे हैं. नयी-नयी टेक्नोलॉजी ने जीवन को अत्यंत आरामदेह बना दिया है. पैसा है, तो इंद्रलोक यहीं है. विशेषज्ञ मानते हैं, आज दुनिया जिस खुशहाली या बेहतर स्थिति में है, मानव इतिहास में इससे पहले कभी नहीं रही. पर टेक्नोलॉजी हमेशा मूल्य निरपेक्ष (वैल्यू न्यूट्रल) होती है. इसका उपयोग हम किस तौर-तरीके से करते हैं, इसी पर भविष्य निर्भर है. अनेक समझदार लोग और भाषा की समझ रखनेवाले विशेषज्ञ भी मानने लगे हैं कि एसएमएस, टिंगलिश, हिंगलिश और फ़ेसबुक के इस दौर में युवाओं के बीच एक नयी भाषा विकसित हो रही है. यह भाषा शुद्ध रूप से व्यापार, लेन-देन या कामकाज की भाषा है. इसमें आकर्षण, रोमांस और भाव नहीं है.

आधुनिक बच्चों में भाषा का संस्कार विकसित नहीं हो रहा है. कंप्यूटर और एसएमएस ने एक नयी शब्दावली गढ़ दी है. बच्चे अपने नये विचारों के लिए नये कोडवर्ड लगातार विकसित कर रहे हैं. घर के अभिभावक तो इन शब्दों को समझ भी नहीं पाते. टेक्नोलॉजी में महारत हासिल कर चुके और टीवी की दुनिया में डूबे युवाओं-बच्चों की पीढ़ी ने एक नया शब्द भंडार बना लिया है. इस शब्द भंडार का भाषा विज्ञान से कोई सरोकार नहीं है. संवेदना, मनोविज्ञान और भाव से भी नहीं. ये शुद्ध लेन-देन, कामकाज की नीरस भाषा है. समाजशास्त्री इसका असर बाद में देखेंगे. पर पहला असर तो दिखता है कि इसनेसाहित्य (उपन्यास, गद्य, कविता, कहानी वगैरह) से लोगों को दूर कर दिया है.

-पैसे से वोट-
बृहनमुंबई म्युनिशिपल कारपोरेशन (बीएमसी) के चुनाव हुए. 16 फ़रवरी को. इस चुनाव में कौन जीता या हारा (बीजेपी-शिवसेना को 227 में से 106 सीटें मिलीं), यह महत्वपूर्ण नहीं है. इस निगम का बजट चार बिलियन डॉलर है (तकरीबन 20,000 करोड़ रुपये). भ्रष्टाचार इस संस्था की रग-रग में है. यह पढ़े-लिखे लोगों का शहर है. संपन्न और जागरूक लोगों का महानगर. पर महज 46 फ़ीसदी लोग वोट देने निकले. ये खबरें खूब आयीं कि मतदान के लिए पैसे दिये गये. रात में पैसे बांटे जाते थे. खबरों पर यकीन करें, तो मतदाता पैसा मांगता था. प्रति मत पच्चीस सौ से चार हजार रुपये की बोली लगने की सूचना मिली. जहां मत देनेवाले मत की कीमत मांगें? जहां सिर्फ़ पैसेवाले चुनाव लड़ पायेंगे? जहां पढ़े-लिखे लोग वोट नहीं देंगे? क्या यही लोकतंत्र है? ये खबरें कारोबार और व्यापार के महानगर से आ रही हैं कि मतदाता भी अपने वोट का मोलभाव करने लगे हैं. फ़िर लोकतंत्र जीवित कहां है?

This Article Posted on: March 4th, 2012

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