सरकार की नीति, बीएसएल ले बीती

बोकारो : बोकारो स्टील प्लांट ने सरकार के आदेशों को ठेंगा दिखाया है. ऐसा बार-बार हुआ है. शायद प्रबंधन की यह पुरानी फितरत है. बीते 35-40 सालों में बीएसएल प्रबंधन ने सरकार के कई दिशा-निर्देशों और निर्णयों की तिलांजलि दी है.

इस कारण ही कई समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया. और नयी समस्याएं जन्म लेती गयी. चार साल पहले झारखंड सरकार ने विस्थापितों के मुआवजा पुनर्निधारण व वितरण के लिए जो कमेटी बनायी थी, उसके साथ भी प्रबंधन ने वही सलूक किया.

सरकार ने विस्थापितों के हितों को ध्यान में रख कर यह समिति बनायी थी. इसमें बीएसएल का हित भी निहित था. किंतु, प्रबंधन ने समिति को साथ लेकर चलने, या कहें सरकार के निर्देश को मानने की कोई आवश्यकता नहीं समझी. नतीजा, विस्थापितों की जय घोष राशि को लेकर विरोध व असंतोष बना हुआ है.

शिबू ने दिया था सुझाव

बीएसएल के विस्थापितों का मुआवजा लंबे समय से फंसा हुआ था. काफी प्रयास और न्यायालय आदि की भागदौड़ के बाद मुआवजा से संबंधित न्याय मिलने की संभावना जगी. इसके लिए सरकार ने राशि भी उपलब्ध करा दी.

मुआवजा का ठीक तरह से निर्धारण और वितरण हो सके, इसी ख्याल से सरकार की स्टेयरिंग कमेटी के चेयरमैन सह पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने एक समिति की आवश्यकता महसूस की. इसके गठन के लिए 1 मई 2008 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को पत्र लिखा.

इसमें बताया गया कि पूर्व की भांति मुआवजा निर्धारण, हकदार चयन व मुआवजा वितरण में किसी तरह का भ्रम, कोई वंचित, या किसी तरह की समस्या न उत्पन्न हो इन समस्याओं से बचने के लिए तथा विस्थापितों को अपनी समस्या का स्वयं निदान ढूंढकर सरकार व संबंधित विभागों को सलाह देने के लिए समिति की आवश्यकता प्रतीत होती है.

इसमें यह भी सुझाव दिया गया कि समिति में विस्थापितों के बीच से एक सदस्य, एक सामाजिक कार्यकर्ता, एक राज्य स्तरीय राजस्व विभाग व एक बोकारो जिला स्तरीय सरकारी अधिकारी सदस्य हो सकते हैं.
- दीपक सवाल -

This Article Posted on: April 25th, 2012

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