पार्टियां पाई-पाई का स्रोत क्यों नहीं बतातीं

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Feb 2015 7:24 AM

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बेहतर होता कि सक्षम एजेंसी राजनीतिक दलों की फंडिंग की तुरंत जांच शुरू कर देती. साथ ही भाजपा व कांग्रेस यह घोषणा करतीं कि अमुक तारीख के बाद से पार्टी को मिलनेवाले चंदे के पाई-पाई का हिसाब और सूची उनकी वेबसाइटों पर देखी जा सकेगी. दिल्ली विधानसभा चुनाव में राजनीतिक फंड के सोर्स का मुद्दा […]

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बेहतर होता कि सक्षम एजेंसी राजनीतिक दलों की फंडिंग की तुरंत जांच शुरू कर देती. साथ ही भाजपा व कांग्रेस यह घोषणा करतीं कि अमुक तारीख के बाद से पार्टी को मिलनेवाले चंदे के पाई-पाई का हिसाब और सूची उनकी वेबसाइटों पर देखी जा सकेगी.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में राजनीतिक फंड के सोर्स का मुद्दा चर्चा में है. यह सवाल बार-बार उठता रहा है, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों में अपने फंड की एक-एक पाई के सोर्स को सार्वजनिक न करने को लेकर एका है और इसलिए इस पर बयानबाजी एक सीमा तक ही होती है और फिर सब चुप हो जाते हैं. इस बार यह मुद्दा भाजपा और एक हद तक कांग्रेस इसलिए उठा रही है, क्योंकि अपने को पारदर्शी कहनेवाली पार्टी के फंड का मामला है और यह पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव में उनके लिए सिरदर्द बनी हुई है. मामला उठाया ‘आवाम’ नामक संगठन ने. आवाम कब, कैसे और क्यों बना, इसकी जानकारी तो फिलहाल मुङो नहीं है, लेकिन मेरे मन में 50-50 लाख के चंदे को लेकर कुछ स्वाभाविक सवाल उठ रहे हैं- सात माह से ‘आप’ की वेबसाइट पर इस चंदे की जानकारी है, तो सरकारी एजेंसियों ने इसे अनदेखा क्यों किया? जो पार्टियां अपने चंदे के बड़े हिस्से को देनेवालों के नाम पब्लिक नहीं करतीं, वे इस पर सवाल उठा रहीं हैं! उन पार्टियों को अपने दानदाताओं के नाम उजागर करने में क्या दिक्कत आ रही है? इस पूरे मामले में अपराधी कौन है? उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? मामला तो स्वत:संज्ञान का बनता है. होना तो यह चाहिए कि संबंधित एजेंसियां स्वत:संज्ञान लेकर जांच करें और अपराधियों को सामने लायें, पर इसकी उम्मीद न के बराबर है. ऐसा मैं क्यों कह रहा हूं?
यह एक रहस्य ही है कि अपने देश के राजनीतिकों की फंडिंग कौन करता है. दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ (4 मई, 2014) के मुताबिक कांग्रेस की कुल आय के 93.8 फीसदी और भाजपा की कुल आय के 91.3 फीसदी का सोर्स सार्वजनिक नहीं किया जाता है. इसे अनडिसक्लोज्ड सोर्स की श्रेणी में रखा जाता है, क्योंकि कानूनी तौर पर 20,000 से कम के कंट्रीब्यूशन का सोर्स बताने की बाध्यता नहीं है. 1985 से पहले कॉरपोरेट कंट्रीब्यूशन पर प्रतिबंध था. दरअसल, 1969 में स्वतंत्र पार्टी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए सिरदर्द बनी हुई थी. स्वतंत्र पार्टी को बड़े बिजनेस समूहों का समर्थन मिलता था और फंडिंग भी. स्वतंत्र पार्टी के वित्तीय स्नेत को खत्म करने के लिए इंदिरा गांधी ने कॉरपोरेट डोनेशन पर प्रतिबंध लगा दिया और यहीं से शुरू हुई राजनीति व चुनाव में कालेधन की भूमिका. 1985 में चुनाव सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाते हुए सरकार ने प्रावधान किया कि कॉरपोरेट्स अपने पिछले तीन साल के औसत मुनाफे का पांच फीसदी राजनीतिक दलों को डोनेट कर सकते हैं. मौजूदा प्रकरण में भी इसी प्रावधान के हवाले से कहा जा रहा है कि डोनेशन देनेवाली कंपनियों के पिछले तीन साल के एकाउंट में घाटा है और इसलिए वे डोनेशन नहीं दे सकती हैं.
अब बात करते हैं भाजपा व कांग्रेस के आय कर रिटर्न की. एडीआर के मुताबिक असेसमेंट वर्ष 2011-12 में कांग्रेस की कुल घोषित आय 307 करोड़ रुपये थी और भाजपा की 168 करोड़ रुपये. कांग्रेस की कुल घोषित आय का 51 फीसदी 20,000 से ज्यादा के डोनेशन के जरिये आयी, जबकि भाजपा की 12 फीसदी आय ही 20,000 से ज्यादा के डोनेशन के जरिये आयी. एडीआर के ही मुताबिक 2005 से 2009 के बीच कांग्रेस ने 1951.07 करोड़ रुपये अनडिस्कलोज्ड सोर्सेज के जरिये प्राप्त किये और भाजपा को 952 करोड़ रुपये अनडिस्कलोज्ड सोर्सेज के जरिये मिले. सवाल उठता है कि अनडिस्कलोज्ड सोर्स क्या है और इन्हें डिस्कलोज क्यों नहीं किया जा सकता?
इन पार्टियों का तर्क यह है कि इन छोटी-छोटी राशियों का हिसाब रखना संभव नहीं है और चूंकि इनका हिसाब नहीं है, तो डिस्कलोज करने का सवाल कहां है. यहां उल्लेखनीय यह है कि अभी नयी-नयी बनी आम आदमी पार्टी तो अपने सभी डोनेशन को न सिर्फ दर्ज करती है, बल्कि उन्हें वेबसाइट पर भी डालती है. इस पार्टी के लिए ऐसा करना कैसे संभव हो रहा है? और यदि यह नयी-नवेली पार्टी ऐसा कर रही है तो दूसरी पार्टियां क्यों नहीं? दरअसल सवाल हिसाब रखने में मुश्किलों का नहीं है, सवाल मंशा का और उन स्वार्थो का है, जिन्हें पार्टियां न तो त्यागना चाहती हैं और न सार्वजनिक होने देना चाहती हैं. ऐसे में राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता का सवाल बेमानी ही माना जायेगा.
आप को 50-50 लाख की फंडिंग के सवाल पर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जो बयान दिया, वह भी ध्यान देने योग्य है. जेटली ने कहा कि आप कालेधन को स्वीकार करती रंगे हाथ पकड़ी गयी है. यह हवाला के जरिये कालेधन को सफेद बनाने, और इसके लिए राजनीतिक सिस्टम को इस्तेमाल किये जाने का मामला है. जेटली आश्वस्त हैं कि जब यह मामला संज्ञान में लाया जायेगा, तो सरकारी विभाग कार्रवाई करेंगे. जेटली सही बात कह रहे हैं कि हमारे राजनीतिक सिस्टम को कालेधन को सफेद बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि इसे रोकेगा कौन? यदि सात माह से कोई जानकारी बेवसाइट पर पड़ी हुई है, वह भी विरोधी पार्टी की वेबसाइट पर, जिस पर निश्चित तौर पर निगाह रखी जा रही होगी, तो उस पर जेटली के वित्त मंत्रलय के तहत आनेवाली तथा अन्य अधिकारसंपन्न एजेंसियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की? यदि देश का वित्त मंत्री सार्वजनिक तौर पर यह बयान दे रहा हो कि आप को मिला यह फंड हवाला के जरिये आया है, तो क्या यह सरकारी एजेंसियों के संज्ञान लेने के लिए काफी नहीं है? और यदि वित्त मंत्री का बयान संज्ञान लेने के लिए काफी नहीं है, तो फिर हम सबको यानी देश के आमजन को यह सोचना चाहिए कि हमारे शीर्ष राजनीतिज्ञ कितने जिम्मेवार हैं? सोचने की बात यह भी है कि भाजपा और कांग्रेस अपने अनडिस्क्लोज्ड फंडिंग सोर्सेज को सार्वजनिक क्यों नहीं करतीं? क्या रकम 20,000 से कम होने पर स्वत: सफेद हो जाती है?
बेहतर होता कि सक्षम एजेंसी राजनीतिक दलों की फंडिंग की तुरंत जांच शुरू कर देती और किसी को जांच शुरू कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा न खटखटाना पड़ता. साथ ही भाजपा व कांग्रेस यह घोषणा करतीं कि अमुक तारीख के बाद से पार्टी को मिलनेवाले चंदे के पाई-पाई का हिसाब व सूची उनकी वेबसाइटों पर देखी जा सकेगी, जैसा आप ने किया है. सोचिये ऐसा क्यों नहीं कर रही ये पार्टियां?
राजेंद्र तिवारी
कॉरपोरेट एडिटर
प्रभात खबर

rajendra.tiwari

@prabhatkhabar.in

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