अफ्रीका में 54 देश, चीन ने एक को छोड़ 53 के लिए खत्म किया टैरिफ, एक चाल से किए तीन शिकार
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग. फोटो- एक्स (@BRICSinfo).
China Scraps Tariffs on Africa: चीन अफ्रीका के देशों पर मेहरबानी दिखा रहा है. उसने इस महाद्वीप के 54 देशों में से 53 के लिए ट्रेड टैरिफ को शून्य कर दिया है. चीन ने इस एक कदम से दो दुश्मन देश और ट्रेड सरप्लस के नुकसान सहित तीन निशाने साधे हैं.
China Scraps Tariffs on Africa: चीन ने शुक्रवार से लगभग पूरे अफ्रीका के लिए अपने बाजार खोलने का बड़ा ऐलान किया है. नई नीति के तहत 54 में से 53 अफ्रीकी देशों के लिए आयात शुल्क (टैरिफ) शून्य कर दिया गया है. सिर्फ एक देश एस्वातिनी को इस व्यवस्था से बाहर रखा गया है. इसकी वजह साफ तौर पर राजनीतिक मानी जा रही है.
बीजिंग पहले ही दिसंबर 2024 तक 33 सबसे कम विकसित अफ्रीकी देशों को ड्यूटी-फ्री सुविधा दे चुका था. अब इसे बढ़ाकर 53 देशों तक कर दिया गया है, जो 30 अप्रैल 2028 तक लागू रहेगी. चीन का दावा है कि वह अफ्रीका को एकतरफा शून्य-टैरिफ देने वाली पहली बड़ी अर्थव्यवस्था है.
चीन क्या फायदा उठाना चाहता है?
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम जितना आर्थिक है, उतना ही रणनीतिक भी. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्टचाइना इंस्टीट्यूट की सीनियर रिसर्च फेलो लॉरेन जॉनस्टन कहती हैं कि चीन खुद को एक उदार व्यापार साझेदार के रूप में पेश करना चाहता है, खासकर अमेरिका के मुकाबले. अमेरिका ने अगस्त में कुछ अफ्रीकी देशों पर 30% तक टैरिफ लगा दिए थे, हालांकि अब अधिकांश देशों पर 10% टैरिफ लागू है, क्योंकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने कई शुल्कों को खारिज कर दिया था.
लेकिन असली चुनौती कहीं और है. चीन और अफ्रीका के बीच व्यापार संतुलन काफी बिगड़ा हुआ है. पिछले साल अफ्रीका का चीन के साथ व्यापार घाटा 65% बढ़कर करीब 102 अरब डॉलर हो गया. अफ्रीका मुख्य रूप से कच्चा तेल और खनिज निर्यात करता है, जबकि चीन तैयार माल बेचता है.
क्या अफ्रीका को होगा कोई फायदा?
विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ टैरिफ खत्म करने से यह असंतुलन नहीं बदलेगा. ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के जर्विन नायडू के अनुसार, अफ्रीकी देशों को अब भी कमजोर बुनियादी ढांचे, सीमित औद्योगिक क्षमता और लॉजिस्टिक्स की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में सिर्फ शुल्क में छूट से बड़ा बदलाव मुश्किल है.
हालांकि, कुछ क्षेत्रों और कुछ देशों को फायदा मिल सकता है. कृषि निर्यात जैसे कॉफी, चाय, मेवे और एवोकाडो को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है. विशेषज्ञों का कहना है कि इससे ग्रामीण आय और उत्पादन में सुधार हो सकता है.
इतने बड़े महाद्वीप में एक समान शुल्क-मुक्त नीति लागू करने से लाभ असमान रूप से मिल सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण अफ्रीका, केन्या और मोरक्को जैसे अधिक विकसित और औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं अपने निर्यात को बढ़ाने के लिए बेहतर स्थिति में होंगी.
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स अफ्रीका के राजनीतिक विश्लेषक जर्विन नायडू के अनुसार, कई अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाएं अब भी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही हैं. सीमित औद्योगिक क्षमता, कमजोर लॉजिस्टिक्स और कच्चे माल के निर्यात पर निर्भरता जैसे केवल टैरिफ में कटौती से हल नहीं किया जा सकता.
एस्वातिनी को क्यों छोड़ा?
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस नीति से सिर्फ एक देश एस्वातिनी को बाहर रखा गया है. 2018 तक इसे किंगडम ऑफ स्वाजीलैंड के नाम से जाना जाता था. अप्रैल 2018 में इसका नाम बदलकर किंगडम ऑफ एस्वातिनी किया गया. एस्वातिनी पूरी तरह से लैंडलॉक्ड देश है. यानी यह दक्षिण अफ्रीका (तीन तरफ से) और मोजाम्बिक के बीच में स्थित है. इसका कुल क्षेत्रफल 17,364 वर्ग किलोमीटर है. यह उत्तर से दक्षिण तक लगभग 175 किमी और पश्चिम से पूर्व तक लगभग 130 किमी तक फैला हुआ है.

इतने छोटे से देश से चीन को क्या दिक्कत है? उसने अपने शून्य टैरिफ वाली पॉलिसी से एस्वातिनी को क्यों बाहर किया? इसकी वजह आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक है. एस्वातिनी उन गिने-चुने 12 देशों में शामिल है जो ताइवान के साथ आधिकारिक संबंध बनाए हुए हैं. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और वन चाइना पॉलिसी के तहत उससे संबंध रखने वाले देशों पर दबाव बनाता रहा है.
पिछले महीने, ताइवान के नेता लाई चिंग-ते को एस्वातिनी की यात्रा रद्द करनी पड़ी, जब 3 अफ्रीकी देश- सेशेल्स, मॉरीशस और मेडागास्कर ने उनके विमान को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति नहीं दी. ताइवान ने आरोप लगाया कि इन देशों ने चीन के कड़े दबाव के कारण ऐसा किया.
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चीन का जियो पॉलिटिकल संदेश
एस्वातिनी को बाहर रखकर चीन यह दिखाना चाहता है कि वह अपने दोस्तों के साथ कैसा व्यवहार करता है, और ताइवान के दोस्तों के साथ कैसा. चीन के इस कदम का आर्थिक असर एस्वातिनी पर बहुत ज्यादा असर पड़ने की संभावना नहीं है. हां! उसे ताइवान से ज्यादा आर्थिक समर्थन मिलने की संभावना जरूर बढ़ सकती है. फिलहाल, चीन का यह कदम आर्थिक अवसर के साथ-साथ भू-राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है.
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By Anant Narayan Shukla
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