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सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार drsureshkant@gmail.com आम यों तो हमेशा आम ही रहता है, जो कि आम तौर पर उसे रहना भी चाहिए, क्योंकि आम की किस्मत में ही लिखा है आम होना, वरना वह आम होता ही क्यों? लेकिन चुनाव के समय वह एकदम से खास हो उठता है. चुनाव एक समर है, जिसे छल-फरेब […]

सुरेश कांत
वरिष्ठ व्यंग्यकार
drsureshkant@gmail.com
आम यों तो हमेशा आम ही रहता है, जो कि आम तौर पर उसे रहना भी चाहिए, क्योंकि आम की किस्मत में ही लिखा है आम होना, वरना वह आम होता ही क्यों? लेकिन चुनाव के समय वह एकदम से खास हो उठता है. चुनाव एक समर है, जिसे छल-फरेब से जीता जाता है.
चुनाव के दौरान आम को अचानक खास समझने का एहसास कराना ऐसा ही छल है, जिसके फरेब में वह फौरन आ जाता है और अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार लेता है. इससे नेता को उसके पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की जहमत नहीं उठानी पड़ती. कुल्हाड़ी अलबत्ता नेता खुद ही उसे उपलब्ध कराता है.
ऐसा वह इसलिए करता है कि कहीं वह आम, जिसका कि बहुवचन अवाम यानी जनता होता है, उसके विरोधी नेता की बातों में आकर उसके द्वारा दी गयी कुल्हाड़ी अपने पैरों पर न मार बैठे. वह जानता है कि जो जनता उसकी बातों में आकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार सकती है, वह किसी दूसरे की बातों में आकर भी ऐसा कर सकती है. इससे चुनाव में इस ‘चु’ की ‘नाव’ डूब सकती है और उधर चूना लगानेवाले की पार लग सकती है. सर्वविदित है कि हर नेता चुनाव में जनता को चूना लगाकर अपनी नाव बचाता है.
पूछा जा सकता है कि चुनावी समर के ‘समर’ में ‘स’ से क्या बनता है और ‘मर’ से उसका क्या संबंध है? जवाब में कहा जा सकता है कि समर में, भले ही वह फिर चुनाव का समर हो या कोई और, हालांकि बनता कुछ नहीं, बिगड़ता ही बिगड़ता है, फिर भी समझने के लिए कह सकते हैं कि इसमें ‘स’ से ‘सच’ बनता है, जिसे चुनाव के समर में मरना पड़ता है. नेता चुनाव की बलिवेदी पर सच की बलि चढ़ाने के बाद ही तरह-तरह के झूठ बोलकर जनता को फुसलाता-बरगलाता है, जिन्हें चुनावी भाषा में आश्वासन कहते हैं.
नेता ऐसे-ऐसे झूठ बोलता है, जिन्हें सुनकर खुद झूठ भी पनाह मांगने लगे. वह ऐसा इसलिए कर पाता है, क्योंकि जनता खुद नेताओं से झूठ बोलकर फुसलाया-बरगलाया जाना पसंद करती है. ऐसे में जो नेता ज्यादा से ज्यादा और बड़े से बड़े झूठ बोलता है, जनता उसकी मुरीद हो जाती है. सर्वथा असंभव झूठ जनता को उसका अंधभक्त बनाने का काम सर्वथा संभव कर देते हैं.
अलबत्ता नेताओं द्वारा लगातार झूठ बोलने के कारण वे झूठ बड़ी जल्दी पुराने पड़ने लगते हैं, जिस कारण नेताओं को और बड़े झूठ ईजाद करते रहने पड़ते हैं. फर्क यही है कि झूठ को भी उन्हें सच का जामा पहनाकर पेश करना पड़ता है. सैंया वही बन पाता है, जो झूठों का बड़ा सरताज निकलता है. जनता झूठों के उस बड़े सरताज के सर पर ही ताज रखती है.
आम को चाहे जैसे खाया जाये, उसका तो हर हाल में मरण ही है. आम के बहुवचन अवाम के बारे में भी यही सच है. चुनाव के बाद अवाम की भी गुठली ही रह जाती है, जिसके दाम भी नेता लगाये बिना नहीं रहते.

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