नयी दिल्ली : नीतिगत ब्याज दर तक करने के मामले में रिजर्व बैंक के गवर्नर के अधिकार में कटौती के प्रस्ताव वाले विधेयक के मसौदे पर सरकार पीछे हट गई है और उसने कहा कि यह निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं है कि वह केंद्रीय बैंक के गवर्नर के अधिकारों में कमी करना चाहती है. जल्दबाजी में बुलाए गये एक संवाददाता सम्मेलन में वित्त सचिव राजीव महर्षि के लिए यह स्पष्टीकरण देने में कठिनाई हो रही थी कि मौद्रिक नीति समिति में रिजर्व बैंक के गवर्नर के वीटो का अधिकार खत्म करने के प्रस्ताव का मसौदा किसका था.
उन्होंने यह कह कर कि यह एफएसएलआरसी का प्रस्ताव नहीं है, मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीइए) के दावे का खंडन किया. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह सरकार की ओर से उठाया गया कदम भी नहीं है. उन्होंने इस विवाद को समाप्त करने का प्रयास करते हुए कहा कि ‘भारत के लोग इस रिपोर्ट के मसौदे के मालिक हैं.’ भारतीय वित्तीय संहिता (आइएफसी) के संशोधित मसौदे में नीतिगत ब्याज दर तय करने के लिए रिजर्व बैंक के गवर्नर के वीटो के अधिकार को वापस लेने का प्रस्ताव है जिसको लेकर बहस छिड गयी है.
महर्षि ने कहा कि सरकार ने अभी तक आइएफसी के मसौदे पर अपना विचार नहीं बनाया हैं उन्होंने कहा कि सरकार इस पर टिप्पणियां ले रही है जो इस बात का संकेत है कि यह अभी विचार विमर्श के चरण में है. उन्होंने कहा ‘यह अभी सरकार के लिए एक परिचार पत्र मात्र है. इस लिए इससे यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि सरकार ने आरबीआइ के अधिकार में कुछ कटौती कर दी गयी है या ऐसा करने का फैसला कर लिया है.’
उन्होंने कहा कि विधेयक के मसौदे पर सरकार का विचार उस समय रखा जाएगा जबकि इसे संसद में विचार और मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा. मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने इससे पहले कहा था कि आइएफसी का संशोधित मसौदा वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग (एफएसएलआरसी) की रपट पर आधारित है. आयोग के सदस्य रहे एक गोविंद राव सुब्रमणियन के इस बयान का खंडन कर चुके हैं.
Disclaimer: शेयर बाजार से संबंधित किसी भी खरीद-बिक्री के लिए प्रभात खबर कोई सुझाव नहीं देता. हम बाजार से जुड़े विश्लेषण मार्केट एक्सपर्ट्स और ब्रोकिंग कंपनियों के हवाले से प्रकाशित करते हैं. लेकिन प्रमाणित विशेषज्ञों से परामर्श के बाद ही बाजार से जुड़े निर्णय करें.