Babu Gulab Ray in Hindi: आज ही के दिन 13 अप्रैल 1963 को हिंदी साहित्य ने अपने एक बेहद खास निबंधकार बाबू गुलाबराय को खो दिया था. वे ऐसे लेखक थे जिन्होंने न सिर्फ लिखा, बल्कि हिंदी को विचारों की भाषा बनाने में भी अहम भूमिका निभाई. इटावा में जन्मे गुलाबराय ने आगरा से दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की और अंग्रेजी में लिखना शुरू किया, लेकिन जल्द ही उन्होंने हिंदी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना लिया. ‘मेरी असफैलें’ और ‘ठलुआ क्लब’ जैसी रचनाएं आज भी उनकी सादगी और गहरी सोच की मिसाल हैं. उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 2002 में उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया. आइए जानते हैं उनके जीवन के खास पहलू.
Babu Gulab Ray: इटावा में जन्मे, आगरा से शिक्षा
बाबू गुलाबराय का जन्म 17 जनवरी 1888 को उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ था. उनके पिता भवानी प्रसाद न्याय विभाग में मुंसिफ थे. घर का माहौल धार्मिक था, जिसने गुलाबराय के सोचने और लिखने के तरीके को और गहरा कर दिया. उन्होंने आगरा कॉलेज से दर्शनशास्त्र में एमए और फिर एलएलबी किया.
Babu Gulab Rai Biography in Hindi: शुरुआत अंग्रेजी से की, लेकिन जीवन के लिए हिंदी को चुना
उन्होंने अंग्रेजी में दार्शनिक निबंध लिखकर अपने लेखन की शुरुआत की, लेकिन उन्हें लगा कि अपने देश और समाज से जुड़ने के लिए हिंदी सबसे उपयुक्त माध्यम है. उन्होंने ‘शांति धर्म’ और ‘मैत्री धर्म’ जैसी रचनाओं के माध्यम से अपने विचारों को जन-जन तक पहुंचाया.
छतरपुर रियासत में निभाई अहम भूमिका
बाबू गुलाबराय ने मध्य प्रदेश की छतरपुर रियासत में महाराजा विश्वनाथ सिंह जूदेव के साथ करीब 18 साल तक काम किया. इस दौरान वे उनके सलाहकार, सचिव और जज जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे. राजकीय सेवाओं के बाद वे आगरा लौट आए और खुद को पूरी तरह से लेखन और अध्यापन के लिए समर्पित कर दिया.
सरल भाषा, गहरी बात – यही थी उनकी पहचान
बाबू गुलाबराय के लेखन की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सरल और स्पष्ट भाषा थी. ‘मेरी असफैलें’, ‘ठलुआ क्लब’, ‘कुछ उठे, कुछ गहरे’ जैसी रचनाओं में उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में गहरी बातें कह दीं. साथ ही उन्होंने ‘नवरस’ और ‘हिंदी साहित्य का सुबोध इतिहास’ जैसी पुस्तकों में साहित्य की कटु आलोचना भी की.
साहित्य से जुड़ी विरासत
बाबू गुलाबराय ने हिंदी को न केवल अभिव्यक्ति की भाषा के रूप में बल्कि चिंतन और विचार की भाषा के रूप में भी स्थापित किया. आज भी उनके लेख लोगों को सोचने की दिशा देते हैं.
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