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Exclusive: मेरे गांव में लड़कियों को लड़कों जैसी आजादी नहीं है- रिंकू राजगुरु

हालिया रिलीज ज़ी 5 की फ़िल्म 200 हल्ला हो के लिए अभिनेत्री रिंकू राजगुरु एक बार फिर सुर्खियों में हैं. रिंकू की यह फ़िल्म और किरदार असल घटना पर आधारित है. सैराट के बाद रिंकू की यह फ़िल्म भी दलित मुद्दे को उठाती है. रिंकू कहती हैं कि बहुत बुरा लगता है कि हमेशा हमें लोगों को बताना पड़ता है

हालिया रिलीज ज़ी 5 की फ़िल्म 200 हल्ला हो के लिए अभिनेत्री रिंकू राजगुरु एक बार फिर सुर्खियों में हैं. रिंकू की यह फ़िल्म और किरदार असल घटना पर आधारित है. सैराट के बाद रिंकू की यह फ़िल्म भी दलित मुद्दे को उठाती है. रिंकू कहती हैं कि बहुत बुरा लगता है कि हमेशा हमें लोगों को बताना पड़ता है कि ये सब भेदभाव नहीं होना चाहिए. सब एक है. उम्मीद है कि फिल्मों से ही सही कुछ बदलाव हो. उर्मिला कोरी से हुई बातचीत…

200 हल्ला हो को हां कहने की क्या वजह थी?

जब फ़िल्म के निर्देशक सार्थक सर ने मुझे बताया कि उन्होंने एक फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखी है औऱ वो चाहते हैं कि मैं उस फिल्म को करूं. जब फ़िल्म की स्क्रिप्ट मैंने सुनी तो मुझे लगा कि इसे करना चाहिए क्योंकि हिंदी सिनेमा में हम ऐसे विषय को नहीं दिखाते हैं. दलित समाज के ऊपर कोई बात नहीं करना चाहता है. लोग इस विषय को दबा देते हैं. हमें दिखाना चाहिए. मुझे लगा कि इस फ़िल्म के ज़रिए हम बखूबी इस बात को लोगों तक पहुंचा सकते हैं.

अमोल पालेकर एक लीजेंड एक्टर हैं उनके साथ शूटिंग के पहले दिन को कैसे याद करेंगी?

मैं बहुत डरी हुई थी. समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं. क्या कहूं. ऐसा लग रहा था कि मुझे एक्टिंग नहीं आती है. पहली बार सेट पर आयी हूं. अच्छी बात ये थी कि पहले दिन साथ में कोई सीन नहीं था. मैं कोर्ट में पीछे बैठी हूं और सर आगे बात कर सीन कर रहे थे. मैंने बस उनकी तरफ देखा और स्माइल की . हिम्मत ही नहीं हो रही थी उनके पास जाऊं और बात करूं. उनको शायद समझ आ गया कि मैं बहुत ज़्यादा नर्वस हूं. वे खुद मेरे पास आए फिर हमारी बात हुई.

हमारे समाज में जाति के अलावा लड़कियों को सिर्फ लड़कीं होने पर भी बहुत भेदभाव से गुजरना पड़ता है आपको इनका सामना करना पड़ा है?

मैं महाराष्ट्र के अकलून गाँव से हूं. हमारे गांव में लड़कियों को लड़कों जैसी आज़ादी नहीं मिली है . छोटी छोटी बातों को ही देख ले तो जैसे आपके बाल बड़े होने चाहिए. दुप्पटा लेना चाहिए. लड़कों की तरफ नहीं देखना है. गाँव में अभी भी ये सब होता है लेकिन मेरे परिवार में ये भेद नहीं था तो इन सब से मुझे कभी नहीं गुजरना पड़ा लेकिन मैंने देखा है.

पहली ही फ़िल्म सैराट से आपने काफी लोकप्रियता हासिल कर ली है किस तरह से खुद को ग्राउंडेड रख पाती हैं?

सैराट के वक़्त बहुत छोटी थी. पॉपुलैरिटी,स्टारडम ये सब क्या होता है. ये मालूम नहीं था लेकिन हां मज़ा आ रहा था कि लोग मुझे पहचान रहे हैं. मुझे ग्राउंडेड रखना मेरी फैमिली का काम है. उन्होंने मुझे कभी महसूस नहीं होने दिया कि मैं सबसे अलग हूं. स्टार हूं तो मैं आराम करूंगी. सब चीज़ें हम तुम्हे हाथ में लाकर देंगे. ऐसा कभी नहीं हुआ मेरे साथ. मैं आज भी वो सारे काम करती हूं जो एक्ट्रेस बनने से पहले करती थी.

अपने फिल्मों के चुनाव के लिए आप किनकी राय लेती हो?

अपने परिवार के अलावा सैराट के निर्देशक नागराज मंजुले सर से मैं कोई फ़िल्म साइन करने से पहले डिस्कस करती हूं.

एक्टर के तौर पर ओटीटी माध्यम को आप कैसे देखती है?

जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि मैं गाँव से हूं. गाँव में लड़कियां फ़िल्म देखने थिएटर में नहीं जाती हैं लड़के ही थिएटर में जाते हैं. मेरी फिल्म हल्ला हो ओटीटी पर रिलीज हुई है इससे मेरी सहेलियां बहुत खुश हैं कि वे फ़ोन पर मेरी फिल्म देख लेंगी. वरना कब घरवाले थिएटर भेजेंगे और हम लड़कियां फ़िल्म देखेंगे. उनका यही जवाब होता था.

क्या आपकी प्राथमिकता अब हिंदी फिल्में हो गयी हैं?

मैं खुद को मराठी या हिंदी एक्टर नहीं मानती हूं मैं बस एक्टर हूं और मुझे अच्छी अच्छी फिल्में करनी है. कुछ हिंदी फिल्में साइन की है लेकिन उसके बारे में फिलहाल बात नहीं कर सकती हूं.

क्या आप अभी भी पढ़ाई कर रही हैं?

हां अभी 20 साल की हूं. मैं कॉलेज में हूं. मेरे घर में सभी टीचर हैं तो मुझे पढ़ाई का महत्व पता है. सेट पर मैं एक्ट्रेस होती हूं. घर पर मैं स्टूडेंट की तरह पढ़ाई करती हूं.

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