कैलाशविदु सिवन: पहनने को चप्पल नहीं था, धोती में जाते थे कॉलेज, इन बाधाओं से लड़कर पहुंचे इसरो

नयी दिल्ली: मिशन चंद्रयान2 की सॉफ्ट लैंडिंग के दौरान चंद्रमा से महज 2 किमी पहले विक्रम लैंडर का संपर्क इसरो के नियंत्रण कक्ष से टूट गया. इसरो के चेयरमैन के सिवन ने भारी मन से इसकी जानकारी दी. उन्होंने कहा कि तय योजना के मुताबिक सबकुछ अच्छा जा रहा था लेकिन आखिरी क्षणों में हमारा […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |

नयी दिल्ली: मिशन चंद्रयान2 की सॉफ्ट लैंडिंग के दौरान चंद्रमा से महज 2 किमी पहले विक्रम लैंडर का संपर्क इसरो के नियंत्रण कक्ष से टूट गया. इसरो के चेयरमैन के सिवन ने भारी मन से इसकी जानकारी दी. उन्होंने कहा कि तय योजना के मुताबिक सबकुछ अच्छा जा रहा था लेकिन आखिरी क्षणों में हमारा संपर्क टूट गया. हालांकि ऑर्बिटर चंद्रमा की कक्षा में अब भी चक्कर लगा रहा है.

इस बीच शनिवार सुबह इसरो मुख्यालय में पीएम मोदी से गले मिलकर रोते हुए कैलाशविदु सिवन की भावुक कर देने वाली तस्वीरें सामने आईं. पीएम मोदी इसरो के चैयरमेन को गले लगाकर ढांढस बंधाते दिखाई दिए. ये स्वाभाविक ही था क्योंकि के सिवन के लिए ये बहुत महात्वाकांक्षी परियोजना थी. पिछले कई सालों से उनकी टीम दिन-रात एक करके इस मिशन को समर्पित थी और आखिरी क्षणों में गड़बड़ी दिल तोड़ने वाली है. लेकिन विश्वास है कि सब ठीक हो जाएगा.

कैलाशविदु सिवन के लिए ये क्षण और भी ज्यादा मुश्किल इसलिए है क्योंकि बहुत सारी कठिन चुनौतियों का सामना करने के बाद उन्होंने यहां तक का सफर तय किया है. मिशन चंद्रयान के नायक के सिवन की जिंदगी का सफरनामा कैसा रहा आईए जानते हैं…..

कन्याकुमारी में हुआ था के सिवन का जन्म

कैलाशविदु सिवन का जन्म 14 अप्रैल 1957 को तमिलनाडू के कन्याकुमारी जिला स्थित नागरकोइल में हुआ था. किसान माता-पिता कैलाशविदु और चेल्लमा के घर जन्में के सिवन ने बचपन से ही भीषण गरीबी देखी. के सिवन बताते हैं कि जब शिक्षा की बारी आई तो उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से मेरा दाखिला गांव की ही प्राथमिक पाठशाला में करवा दिया गया. यहीं से मैंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की. सिवन ने कहा कि, जब कॉलेज जाना तय किया तो मेरा एक स्थानीय कॉलेज में करवा दिया गया. इसके पीछे वह दो कारण बताते हैं.

‘शिक्षा के आड़े आई गरीबी, हिम्मत नहीं हारा’

सिवन कहते हैं कि, स्थानीय कॉलेज में दाखिला लेने के पीछे दो कारण थे. पहला कि, हमारे आर्थिक हालात ऐसे नहीं थे कि मैं शहर जाकर पढ़ाई कर सकूं. दूसरा कारण ये था कि मेरा परिवार चावल की खेती किया करता था. माता-पिता के लिए अकेले सबकुछ संभाल पाना मुश्किल था. पिता ने मेरा दाखिला स्थानीय कॉलेज में करवाया ताकि मैं उनका हाथ बटा सकूं.

उन्होंने बताया कि मेरे अभिभावक मेरी उच्च शिक्षा को लेकर ज्यादा आशान्वित नहीं थे. कॉलेज की फाइनल परीक्षा में जब मैंने गणित विषय में पूरे 100 फीसदी अंक हासिल किए तब मेरे पिता ने मेरी उच्च शिक्षा का समर्थन किया.

‘बचपन से ही एयरोनॉटिक्स में थी रूचि’

कैलाशविदु सिवन की रूचि बचपन से ही एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में थी. बता दें कि इसरो प्रमुख पहले एक फायटर पायलट बनना चाहते थे. इसलिए, एयरोनॉटिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के लिए इन्होंने ‘एमआईटी मद्रास’ में दाखिला लिया.

‘गरीबी इतनी थी कि चप्पल तक नहीं था’

संघर्ष के दिनों को याद करते हुए के सिवन बताते हैं कि जब मैं स्कूल में था तो मेरे पास पहनने को चप्पल नहीं होता था. मैं नंगे पांव स्कूल जाता था. इन्होंने बताया कि एमआईटी मद्रास जाने के बाद मैंने पहली बार पेंट-शर्ट पहना. कॉलेज जाने तक मैं केवल धोती पहनता था. साल 1980 में उन्होंने एमआईटी मद्रास से ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की.

जानकर हैरानी होगी कि कैलाशविदु सिवन अपने परिवार में एकमात्र ग्रेजुएट हैं. सिवन कहते हैं कि मेरा एक भाई और बहन है. दोनों ने हाईस्कूल तक की पढ़ाई की है क्योंकि आर्थिक हालात ऐसे थे कि कोई एक ही उच्च शिक्षा हासिल कर सकता था. उन्होंने कहा कि मैं अपने भाई-बहनों के त्याग का आभारी हूं.

साल 1982 में इसरो का हिस्सा बने सिवन

ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद कैलाशविदु सिवन ने ‘इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरू’ में दाखिला लिया. यहां से उन्होंने साल 1982 में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग से मास्टर्स की पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई पूरी करते ही कैलाशविदु सिवन को इसरो के साथ जुड़कर काम करने का मौका मिला.

युवा वैज्ञानिक के तौर पर सिवन ने यहां सबसे पहले अंतरिक्ष यान लॉंच व्हीकल पीएसएलवी के निर्माण और विकास का काम किया. इसकी सफलता के बाद सिवन को लांच व्हीकल जीएसएलवी, जीएसएलवी मार्क-3, आरएलवी-टीडी जैसे प्रोजेक्ट के निर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया. अतंरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कार्योजेनिक इंजन के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के लिए के सिवन को ‘रॉकेट मैन’ का नाम दिया गया.

साल 2006 में के सिवन ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी बॉम्बे से एयरोस्पेस इंडीनियरिंग में पीएचडी की डिग्री हासिल की. प्रतिभा और अनुभव को देखते हुए के सिवन को सबसे पहले ‘विक्रम साराभाई स्पेस रिसर्च सेंटर’ का निदेशक बनाया गया. यहीं उन्होंने साल 2017 में एक ही मिशन के अंतर्गत 104 उपग्रह लॉंच करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड कायम किया.

साल 2018 में कैलाशविदु सिवन को ‘इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन’ का चेयरमैन नियुक्त किया गया. इसके बाद से ही वे मिशन चंद्रयान2 की योजना में लगे थे.

फिल्में देखना पसंद करते हैं कैलाशविदु सिवन

विक्रम साराभाई रिसर्च अवॉर्ड, इसरो मेरिट अवॉर्ड, डॉ. बीरेन रॉय स्पेस साइंस अवॉर्ड सहित दर्जनों अवॉर्ड जीतने वाले कैलाशविदु सिवन निजी जिंदगी में बेहद सरल और शांत प्रकृति के हैं. वे ज्यादा बोलना पंसद नहीं करते. कैलाशविदु सिवन ने बताया कि खाली समय में उन्हें बागवानी करना पंसद है. उन्होंने बताया कि विक्रम साराभाई स्पेस रिसर्च सेंटर में काम करने के दौरान मैं तिरूवनंतपुरम स्थित आवास के लॉन में बागवानी किया करता था.

बागवानी के अलावा इसरो चीफ को तमिल शास्त्रीय संगीत काफी पसंद है. जब भी खाली समय मिलता है वो अपना काम निपटाते हुए तमिल क्लासिकल म्यूजिक सुनना पसंद करते हैं. के सिवन ने बताया कि उन्हें फिल्में देखना बहुत पसंद है लेकिन इसके लिए कम ही समय मिल पाता है. सिवन ने बताया कि राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर अभिनीत ‘अराधना’ उनकी ऑलटाइम फेवरेट फिल्म है.

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