मिशनरियों की चैरिटी में निहितार्थ होते हैं, वह सेवा नहीं व्यापार बन जाती है : डॉ कृष्ण गोपाल

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ईसाई मिशनरियों का सीधा नाम लिये बिना आज कहा कि भारत के बाहर की धरती से जो चैरिटी आ रही है उसमें निहितार्थ छिपे होते हैं, जिससे सेवा सेवा नहीं रहकर व्यापार बन जाती है. संघ के सहसरकार्यवाह डा. कृष्ण गोपाल ने आज यहां पांच साल के अंतराल […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | April 4, 2015 3:31 PM

नयी दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ईसाई मिशनरियों का सीधा नाम लिये बिना आज कहा कि भारत के बाहर की धरती से जो चैरिटी आ रही है उसमें निहितार्थ छिपे होते हैं, जिससे सेवा सेवा नहीं रहकर व्यापार बन जाती है. संघ के सहसरकार्यवाह डा. कृष्ण गोपाल ने आज यहां पांच साल के अंतराल पर आयोजित किये गये संघ के ‘राष्ट्रीय सेवा संगम’ में यह बात कही. उन्होंने आजादी से पहले एक हजार साल के विदेशी शासनों की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक हजार साल का कठिन दौर सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक बदहाली का दौर था और ऐसा लग रहा था कि हिंदू समाज तितर बितर हो गया है, बहुत कुछ टूट गया है और छूट गया है.

उन्होंने कहा कि हजार वर्ष की यह यात्रा लंबी और संघर्षपूर्ण रही और आरएसएस की स्थापना हिंदू समाज के स्वास्थ्य को बदलने के लिए हुई. कृष्ण गोपाल ने कहा, ‘भारत के बाहर की धरती से जो चैरिटी आती है उसमें निहितार्थ जुडे होते हैं और जब चैरिटी में निहितार्थ छिपे होते हैं तो सेवाभाव नहीं रह जाता है, सेवा भाव के अभाव में वह व्यापार बन जाता है, जबकि इसके उलट भारत में नि:स्वार्थ सेवा का दर्शन है.’

उन्होंने कहा, ‘हमारे समक्ष एक हजार साल का बैकलॉग है, जिसे अब पूरा करना है. अब हिंदू समाज अपनी स्वाभाविक शक्ति, मेधा और स्वाभिमान से खडा है. हम (संघ) हिंदू समाज के साथ देश और दुनिया के सभी लोगों की चिंता करेंगे.’ उन्होंने कहा कि आने वाले समय में हमें अपने कार्यकर्ताओं के परिवार का और विस्तार करने की जरुरत है. हमें प्रतिभावान कार्यकर्ताओं को जोडना होगा.

संघ के एक अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी अजीत प्रसाद महापात्र ने देश के लोगों का आह्वान किया कि वह छोटे-छोटे ट्रस्ट और संस्थाएं बनाकर राष्ट्र सेवा भारती से जुडें. इस कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के ‘राष्ट्र सेवा भारती’ ने किया है, जिसके अंतर्गत संघ के देशभर के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत 800 संगठन आते हैं. आज यहां ऐसे ही संगठनों के 4000 प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन उत्तर पश्चिम दिल्ली के अलीपुर क्षेत्र में आयोजित किया गया.

इस संगम का उद्घाटन माता अमृतानंदामयी ‘अम्मा’ ने किया. उन्होंने कहा कि राजा के लिए राजधर्म सर्वोपरि होता है और वह किसी में विभेद नहीं करता तथा हमें अपने शब्दों, वचनों को सोच समझकर प्रयोग करना चाहिए. अम्मा ने कहा कि जैसे भगवान श्रीराम के समक्ष मां सीता के बारे में एक धोबी द्वारा शंका प्रकट करने पर उन्होंने उसकी जांच करायी हालांकि उन्हें मां सीता पर पूरा विश्वास था, लेकिन उस समय उन्होंने राजधर्म का पालन करते हुए धोबी और मां सीता में कोई विभेद नहीं किया.

मां अमृतानंदामयी ने कहा कि हमें शब्दों और वचनों का सोच समझकर प्रयोग करना चाहिए क्योंकि यह उदाहरण है कि कुंभकरण ने इंद्रासन की बजाय निद्रासन मांग लिया था, जिसका परिणाम हम सबके सामने आया. उन्होंने कहा कि असावधानी से बोला गया एक भी शब्द बडा कारण खडा कर सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि हमें बदलते समय के अनुसार उचित नये विचारों को अपनाने और अप्रासंगिक हो चुके पुराने को छोडने के लिए तैयार रहना चाहिए.

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