आरटीआइ कार्यकर्ताओं पर खतरे
सूचना का अधिकार कानून लागू कराना यूपीए सरकार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में हमेशा याद किया जायेगा. भारतीय जनमानस को प्राप्त यह ऐतिहासिक अधिकार सरकारी विभागों की पारदर्शिता और लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनाये रखने में प्रभावी है. यह कानून बीते नौ वर्षो में कई उपलब्धियां कायम कर चुका है. दरअसल इस कानून की […]
सूचना का अधिकार कानून लागू कराना यूपीए सरकार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में हमेशा याद किया जायेगा. भारतीय जनमानस को प्राप्त यह ऐतिहासिक अधिकार सरकारी विभागों की पारदर्शिता और लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनाये रखने में प्रभावी है. यह कानून बीते नौ वर्षो में कई उपलब्धियां कायम कर चुका है.
दरअसल इस कानून की यह प्रमुख विशेषता है कि एक आम आदमी महज 10 रु पये के मामूली खर्च से किसी भी प्रकार की सरकारी जानकारी प्राप्त कर सकता है. इसी का परिणाम है कि न सिर्फ शहरी, बल्कि बड़ी संख्या में ग्रामीण लोगों ने जन वितरण प्रणाली, मनरेगा के तहत तरह-तरह की जानकारियां, कार्यालयों में लंबित विभिन्न प्रकार के कागजात आदि के बारे में सही जानकारी पायी है, जो एक जागरूक समाज की तसवीर पेश कर रहा है.
तसवीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सूचना दिलाने में मध्यस्थता की भूमिका निभानेवाले हमारे ही बीच के कार्यकर्ताओं के जान पर बन आयी है. एक हालिया रिपोर्ट की मानें तो पिछले छह महीने में लगभग ढाई सौ कार्यकर्ताओं को अपने जान से हाथ धोना पड़ा है. इससे और अधिक शर्मनाक बात हमारे लिए क्या हो सकती है कि एक तरफ हम पारदर्शी लोकतंत्र की बात करते हैं, जनता को जनार्दन मान कर उन्हें सारी बातों से अवगत कराना चाहते हैं तो दूसरी तरफ इसकी मध्यस्थता में महत्वपूर्ण कड़ी निभानेवाले निदरेष कार्यकर्ताओं को उसके जुझारूपन और ईमानदारी की सजा देते हैं. यूपीए सरकार के आकड़ों पर गौर करें तो कई करोड़ लोगों ने इस अधिकार का प्रयोग कर न्याय प्राप्त किया है. कानून का किताबी ज्ञान जानना अलग बात है लेकिन उसे व्यावहारिक रूप देने की जरूरत तो पड़ेगी ही. हमारी नयी सरकार को इस पर अमल करना चाहिए.
सुधीर कुमार, राजाभीठा, गोड्डा