संतोष उत्सुक
वरिष्ठ व्यंग्यकार
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वक्त ने बुद्धिजीवियों को नष्ट करने की काफी कोशिश की. सामाजिक बदलावों के साथ लोगों की बुद्धि ने भी रूप बदले हैं, तभी यह पता नहीं चलता कि कौन सा ‘बुद्धिजीवी’ बुद्धिमान है और कौन अबुद्धिमान. बुद्धि का रंग दिखता कुछ और है और निकलता कुछ और है. सही या गलत स्थापित करने की दुविधा तो हर जमाने में रही है. लेकिन जितना पंगा अब व्यवस्था के खिलाफ न होकर, सम्मानित बुद्धिजीवियों का आपस में होने लगा है, इस कारण बुद्धि के रेट्स आसमान छू रहे हैं. इस बहस में आग लगी हुई है कि सही बुद्धिजीवी कौन है. ‘बुद्धि’, अब असमंजस का विषय बनती जा रही है. समझ नहीं आ रहा कि विश्वगुरुओं के देश में महागुरु कौन है, माफ करें असली बुद्धिमान बुद्धिजीवी कौन है.
बुद्धिमान होने के नये-नये प्रतिमान सामने आ रहे हैं. नेता, अक्सर स्वार्थ के घोड़ों पर सवार अलग-अलग दिशाओं में दौड़ते हुए, एक-दूसरे को कोसते हुए, देश प्रेम की बात करते दिखते हैं. इसका प्रभाव बुद्धिमानों पर भी पड़ा है.
‘इधर’ के समझदार लोग रंग, डिजाइन और खुशबू की बातें करते हैं, तो ‘उधर’ के समझदार लोग हवा, आग और पानी की बातें करते हैं. दरअसल बातें दोनों समझदारी की कर रहे होते हैं, लेकिन खुद को ज्यादा समझदार समझने के चक्कर में गुस्ताखी हो जाती है. बुद्धि कहती है, ये लोग एक साथ बैठकर बातें करें, तो ज्यादा बुद्धिमानी मानी जा सकती है.
नयी व्यवस्था तो यही समझाती है कि जब एक ही किस्म के ज्यादा लोग शक्ति की बुद्धि हासिल कर लें, तो वे ज्यादा बुद्धिमान माने जायेंगे. उदाहरणतया किसी भी तरह का शक्तिशाली व्यक्ति कविता रचेगा तो वह उच्च कोटि की ही होगी. आम कविताएं लिखने के लिए तो सामान्य लोग बहुत हैं.
बुद्धि बहुत खराब चीज होती है, कई बार दिमाग खराब कर देती है. समय के साथ सही तरीके से प्रयोग न की जाये, तो नुकसान करती है. ‘राजनीतिक’ पूर्वाग्रह दिमाग में घुस जाये, तो एक बुद्धिजीवी दूसरे बुद्धिजीवी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब करनेवाला और मानवता के खिलाफ दिखता है.
किसी समय में बुद्धिजीवी अपने क्रियाकलापों के माध्यम से समाज व राष्ट्र को नयी व सही दिशा देने का साहसिक प्रयास करते थे. अब हमारा सभ्य समाज और देश अत्यंत विकसित हो है.
सामयिक बुद्धिमत्ता इस बात की मांग करती है कि जब देश में सभी नदियां एक तरफ बह रही हों, बुजदिली, हिम्मत और बहादुरी, सब एक जैसा खाना खा रही हों, तो बुद्धिमान बुद्धिजीवियों को सामाजिक और आर्थिक असमानता, गुस्सा, नफरत, बदला, विकास से विनाश जैसे तुच्छ विषयों पर अपना कीमती समय नष्ट नहीं करना चाहिए. क्योंकि यह सब प्रवृत्तियां सृष्टि की देन हैं.
इनमें बदलाव लाने का मानवीय बुद्धि का दखल कभी सफल नहीं हो सका है. बुद्धिमान बुद्धिजीवी लोगों को विश्व स्तर की बढ़िया मनोरंजक किताबें पढ़नी चाहिए, निश्छल प्रेम और प्रकृति प्रेम पर कविताएं लिखनी चाहिए और घर के कामकाज में पत्नी का हाथ बंटाना चाहिए.

