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संभावनाओं की एक तसवीर

।। एमजे अकबर।। (वरिष्ठ पत्रकार) भारतीय लोकतंत्र में जारी घमसान के इस मौसम मेंसकारात्मक और नकारात्मक तत्व आंख के सामने हैं, लेकिन अभी तक उन्हें स्पष्ट रूप से देख पाना मुमकिन नहीं हो पाया है. यह आश्चर्यजनक है कि पहली बार दिल्ली में कांग्रेस के चुनाव प्रचार के पोस्टरों में सोनिया गांधी की तसवीर, शीला […]

।। एमजे अकबर।।

(वरिष्ठ पत्रकार)

भारतीय लोकतंत्र में जारी घमसान के इस मौसम मेंसकारात्मक और नकारात्मक तत्व आंख के सामने हैं, लेकिन अभी तक उन्हें स्पष्ट रूप से देख पाना मुमकिन नहीं हो पाया है. यह आश्चर्यजनक है कि पहली बार दिल्ली में कांग्रेस के चुनाव प्रचार के पोस्टरों में सोनिया गांधी की तसवीर, शीला दीक्षित की तुलना में छोटी है. इसका सीधा सा अर्थ यह लगाया जा सकता है कि कांग्रेस के भाग्य पर नियंत्रण रखनेवाले परिवार की तुलना में मुख्यमंत्री के नाम पर वोट मिलने की संभावना कहीं ज्यादा है. यह राहुल गांधी की सभा में खाली कुर्सियों से भी जाहिर था. मुख्यमंत्री को वहां जमा चंद लोगों से यह अपील करनी पड़ी कि वे कांग्रेस के सितारे को सुन कर जाएं. यह वोट के लिए नहीं, बल्कि दान देने के लिए की गयी अपील थी.

इसके ठीक विपरीत, राजनीतिक पायदान में ऊपर चढ़ने का सपना देख रहे आंध्र प्रदेश के पूर्व मंत्री पी शंकर राव की इच्छा है कि प्रस्तावित तेलंगाना राज्य का नाम सोनिया गांधी के नाम पर रखा जाये. उन्होंने इसके लिए ‘सोनिया तेलंगाना’ नाम सुझाया है. सऊदी अरब दुनिया में एकमात्र ऐसा देश है, जिसका नाम एक परिवार के नाम पर रखा गया है. इस पर किसी ने आपत्ति नहीं की है. सऊदी लोगों ने भी नहीं. हम यह कल्पना कर सकते हैं कि कांग्रेस में कोई भी सोनिया तेलंगाना नाम का विरोध नहीं करेगा. 1975-77 के आपातकाल के दौरान एक कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने घोषणा की थी कि ‘इंदिरा (गांधी) भारत हैं, भारत इंदिरा है’.

शंकर राव की नाटकीय मांग यह साबित करती है कि तेलंगाना में सोनिया ‘वोट विनर’ हैं. रोड़ा यह है कि वहां उनका मुकाबला एक ऐसी पार्टी से है, जिसने तेलंगाना की मांग के लिए लंबा संघर्ष किया है. इसलिए वहां सोनिया की भारी जीत की कोई संभावना नहीं है. हां, इस किस्से का दूसरा पहलू यह है कि बाकी आंध्र प्रदेश में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो सकता है.

पांच विधानसभा चुनावों के नतीजे आठ दिसंबर को आयेंगे. इस संबंध में कोई भविष्यवाणी करना काफी कठिन है. लेकिन, यह कयास लगाना सुरक्षित है कि कांग्रेस की जमीन में सिकुड़न जारी रहेगी और कांग्रेस का पतन उसकी उम्मीदों से भी ज्यादा होगा. कांग्रेसशासित राजस्थान में नरेंद्र मोदी मतदाताओं के साथ जिस तरह से जुड़ने में कामयाब हो रहे हैं, वह एक कहानी खुद बयान करता है. निजी वार्तालापों में कांग्रेस नेता स्वीकार करते हैं कि वे राहत की सांस लेंगे अगर कांग्रेस को किसी एक राज्य- संभवत: छत्तीसगढ़ में जीत मिलती है. अगर दिल्ली उसकी झोली से न छिटके, तो यह बहुत बड़ा बोनस होगा.

राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली, चारों जगह पर हार का खतरा कांग्रेस का सबसे बड़ा दु:स्वप्न है. इसने उसे चिंतित कर रखा है. अगर ऐसा होता है, तो सारे तर्क झूठे पड़ जायेंगे. चुनाव सर्वेक्षण के धंधे में लगे लोगों का कहना है कि जब बात राज्य की जगह राष्ट्रीय चुनाव की होती है,तो देश के अधिकांश हिस्सों में कांग्रेस के लिए नकारात्मक खाई काफी ज्यादा बड़ी हो जाती है. पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने जा रहा है और आम चुनाव नजदीक है. इस आखिरी चरण में कांग्रेस के पास क्या विकल्प है?

पहला लालच यह हो सकता है कि सारी गलतियों के लिए डॉक्टर मनमोहन सिंह को कसूरवार ठहराया जाये. यह संदेश देने की कोशिश की जाये कि पार्टी के साथ कुछ भी खराब नहीं है. सारी खराबी दिवालिया सरकार के साथ है, जिसने कीमतों को बढ़ने दिया. भ्रष्टाचार पर केंद्रित बहस को गिरती अर्थव्यवस्था पर केंद्रित करने की कोशिश की जायेगी.

भ्रष्टाचार में किसी-न-किसी को लाभ मिलता है और ये परिवार के नजदीकी हो सकते हैं. लेकिन, ऐसे बहाने सिर्फ टेलीविजन एंकर्स से थोड़ा सा अधिक समय पाने में कारगर साबित हो सकते हैं. वोटर यह सवाल पूछेगा : अगर सरकार निकम्मी थी, तो फिर कांग्रेस ने इसे इतने समय तक बर्दाश्त क्यों किया? वोटर पलट कर यह कहेगा, कांग्रेस भले प्रधानमंत्री को नहीं बदल सकती, लेकिन जनता यह काम कर सकती है. तो क्या कांग्रेस को नये प्रधानमंत्री के नाम की घोषणा कर देनी चाहिए? कांग्रेस के कुछ उत्साही लोग यह प्रस्ताव पहले से ही दे रहे हैं कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बना दिया जाना चाहिए.

इसमें समस्या नहीं होती, अगर लोकसभा में कांग्रेस को साधारण बहुमत होता. मनमोहन सिंह कभी बाधा नहीं थे. नये प्रधानमंत्री को अगर अपना नाम इतिहास में दूसरे चरण सिंह के तौर पर नहीं दर्ज कराना, तो उन्हें लोकसभा में विश्वास मत जीतना होगा. क्या राहुल गांधी यूपीए-2 के घटकों के समर्थन को लेकर निश्चिंत हो सकते हैं? यह पीड़ित घटक दलों के लिए अपना गुस्सा दिखाने का मौका साबित हो सकता है. यहां तक कि शरद पवार जैसे प्रसन्न सहयोगी ने भी संकेत दिया है कि वे राहुल का समर्थन नहीं करेंगे. अगर, आठ दिसंबर, कांग्रेस के लिए बुरी खबर लेकर आता है, तो कांग्रेस के पास सबसे तार्किक विकल्प संसद को यह सूचित करना होगा कि अब शासन चला पाना मुमकिन नहीं होगा, इसलिए एकमात्र सम्मानीय रास्ता तुरंत चुनाव कराना है. यह दिखाना कि कुछ भी नहीं हुआ है और अप्रैल-मई में सर्वश्रेष्ठ परिणाम की उम्मीद लगाना अतार्किक होगा. आपको क्या लगता है, इन दोनों में से क्या होनेवाला है?

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