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सचिन भारत रत्न पानेवाले पहले खिलाड़ी, प्रो सीएनआर राव को भी भारत रत्न

सचिन ने ही नहीं सीएनआर राव ने भी छुआ है 100 का आंकड़ा मुंबई : महान बल्लेबाज सचिन तेंडुलकर ने अपने 24 साल और एक दिन के ओजस्वी कैरियर के बाद शनिवार को क्रिकेट को अलविदा कहा. सचिन के संन्यास के साथ ही विश्व क्रिकेट में एक युग का समापन हो गया. एक ऐसा युग, […]

सचिन ने ही नहीं सीएनआर राव ने भी छुआ है 100 का आंकड़ा

मुंबई : महान बल्लेबाज सचिन तेंडुलकर ने अपने 24 साल और एक दिन के ओजस्वी कैरियर के बाद शनिवार को क्रिकेट को अलविदा कहा. सचिन के संन्यास के साथ ही विश्व क्रिकेट में एक युग का समापन हो गया. एक ऐसा युग, जिसमें सचिन ने क्रिकेट के हर रिकार्ड को अपनी धरोहर बना कर रखा.

शनिवार को जब सचिन वानखेड़े स्टेडियम के पिच को चूम कर स्टेडियम से बाहर निकले, तो स्टेडियम के भीतर मौजूद हजारों और पूरे देश के लाखों प्रशंसकों की आंखों में आंसू छलक पड़े. विदाई के साथ ही सचिन तेंदुलकर को सर्वश्रेष्ठ तोहफा भी मिला. देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने का एलान किया गया. भारत रत्न का सम्मान पाने वाले पहले खिलाड़ी सचिन तेंडुलकर ने यह सम्मान अपनी मां को समर्पित किया है.तेंडुलकर ने सबसे सफल बल्लेबाज के रूप में अंतरराष्ट्रीय क्रि केट को अलविदा कहा. उन्होंने 200 टेस्ट में 15,921 रन बनाने के अलावा 463 वनडे मैचों में 18,426 रन भी बनाये. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 100 शतक जड़ने वाले वह एकमात्र बल्लेबाज रहे. वह वनडे मैचों में दोहरा शतक जड़ने वाले पहले बल्लेबाज भी हैं.

एक समाचार चैनल के मुताबिक तेंदुलकर ने इस सम्मान को अपनी मां को समर्पित किया है. वेस्टइंडीज के खिलाफ मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में विदाई टेस्ट समाप्त होने के बाद तेंदुलकर को देश के इस शीर्ष नागरिक पुरस्कार के लिए चुना गया. तेंदुलकर के अंतिम अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान उनकी मां भी दर्शकों के बीच मौजूद थी.

दिग्गज क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर व वैज्ञानिक प्रोफेसर सीएनआर राव को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने का शनिवार को सरकार ने फैसला किया. भारत रत्न पा चुके 43 विशिष्ट लोगों की जमात में दोनों विभूतियां शामिल हो गयी हैं.

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी दोनों दिग्गजों को 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर यह सम्मान प्रदान करेंगे. सचिन के अपने 200वें और अंतिम टेस्ट मैच खेलने के कुछ ही देर बाद राष्ट्रपति भवन की ओर से उन्हें यह सम्मान देने की घोषणा हुई. वहीं, प्रो चिंतामणि नागेसा रामचंद्र राव सालिड स्टेट एंड मटीरियल रसायनशास्त्र क्षेत्र के ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक हैं. अब तक 1400 अनुसंधान पत्र और 45 पुस्तकें छप चुकी हैं. वर्ष 2008 में हिंदुस्तानी संगीत के दिग्गज भीमसेन जोशी को अंतिम बार भारत रत्न दिया गया था. प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने स्वयं फोन कर सचिन और सीएनआर राव को भारत रत्न सम्मान दिये जाने की सूचना के साथ बधाई भी दी.

* देश के तीसरे वैज्ञानिक हैं सीएनआर

प्रोफेसर चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव, जिन्हें हम प्रोफेसर सीएनआर राव के नाम से भी जानते हैं, भारतीय विज्ञान जगत में एक बड़ा नाम हैं. इस समय वह भारत के प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख हैं. प्रोफेसर चिंतामणि नागेश रामचंद्र (सीएनआर) राव भारत रत्न से सम्मानित किये जानेवाले तीसरे वैज्ञानिक हैं. भारत रत्न से सम्मानित किये जाने की घोषणा के साथ ही राव के साथ एक और उपलब्धि जुड़ गयी. राव से पहले सीवी रमन और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को भारत रत्न से नवाजा जा चुका है.

79 साल के प्रोफेसर राव 60 विश्वविद्यालयों द्वारा मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किये जा चुके हैं, जिससे पता चलता है विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया भर में उनकी कितनी स्वीकार्यता है. बेंगलुरु के जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च के संस्थापक राव ने विभिन्न सरकारों के शासनकाल में प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष के तौर पर काम किया है. अलग-अलग सरकारों ने उनकी काबिलियत पर पूरा भरोसा किया. राव ने खासकर सॉलिड स्टेट एंड स्ट्रक्चरल कैमिस्टरी के क्षेत्र में काम किया है. राव अभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख हैं.

बेंगलुरु में हनुमंत नागेश राव और नागम्मा नागेश राव के घर 30 जून 1934 को जन्मे राव यदि चाहते, तो 1951 में बीएससी की पढ़ाई के बाद कोई आराम-तलब नौकरी कर सकते थे, पर ज्ञान प्राप्त करने की उनकी चाह ने उन्हें कभी न खत्म होने वाले वैज्ञानिक सफर पर रवाना कर दिया.

साल 1951 में मैसूर विश्वविद्यालय से बीएससी करने के बाद राव भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) से केमिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा या पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री लेना चाहते थे पर किस्मत उन्हें बनारस हिंदू विश्रविद्यालय (बीएचयू) ले गयी जहां उन्होंने एमएससी के पाठ्यक्रम में दाखिला लिया. राव ने परडय़ू यूनिवर्सिटी से 1958 में पीएचडी पूरी की और 1963 में आइआइटी कानपुर में अध्यापन का काम करने लगे. राव ने एक लेख में लिखा था, मेरे पिता चाहते थे कि मैं अंगरेजी भी बोलूं और मुझे इससे फायदा हुआ कि घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल था. राव के स्कूली दिनों में स्वतंत्रता आंदोलन जोर-शोर से चल रहा था. उस वक्त किशोरवय में रहे राव पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे नेताओं के भाषण बड़े चाव से सुना करते थे. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की कुछ बैठकों में भी हिस्सा लिया था.

* सीएनआर एजुकेशन फाउंडेशन : युवाओं में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए इस फाउंडेशन की स्थापना की गयी. तब तेल अवीव विवि की तरफ से डैन डेविड अवार्ड दिया गया. अवार्ड में मिली राशि का इस्तेमाल फाउंडेशन के लिए किया गया. उनकी पत्नी इंदुमति फाउंडेशन का काम देखती हैं.

* राव से खास बातचीत

– आप हठी हैं, तो कोई रोक नहीं सकता

डॉ सीएनआर राव भारत में मिस्टर विज्ञान के रूप में जाने जाते हैं. उन्हें दुनिया भर से डॉक्टरेट की 40 मानद उपाधि मिल चुकी हैं. वह एक चर्चित भौतिक रसायनशास्त्री हैं. वह वर्तमान में बेंगलुरु के जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस साइंटिफिक रिसर्च में बतौर रिसर्च प्रोफेसर काम कर रहे हैं. प्रो राव प्रधानमंत्री की साइंस एडवाइजरी कमेटी के चेयरमैन भी हैं. शायद ही कोई अकादमी है, जिसने उन्हें रिसर्च फैलो नहीं बनाया. रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंस, अमेरिका, रशियन एकेडमी ऑफ साइंस, पॉटिफिलिक एकेडमी ऑफ साइंस, फ्रैंच एकेडमी ऑफ साइंस और जैपनीज एकेडमी ऑफ साइंस जैसी दिग्गज संस्थाएं उन्हें अपना रिसर्च फैलो बना चुकी हैं. आम धारणा है कि अगर डॉ राव किसी पश्चिमी देश में कार्य कर रहे होते, तो उन्हें अब तक आसानी से नोबेल पुरस्कार मिल चुका होता. यहां पेश हैं उनसे एक बातचीत

* प्रश्न : अपने बारे कुछ बताइए. विज्ञान के प्रति कैसे आकर्षित हुए. आपने कहीं कहा था कि आपको मां ने पढ़ाया?

राव: मैं बेंगलुरु में पैदा हुआ. मैं प्राथमिक स्कूल नहीं जा पाया. मैंने औपचारिक रूप से मिडिल स्कूल से पढ़ाई शुरू की. मेरी मां आध्यात्मिक महिला थीं. वह कई घंटों तक पूजा करतीं थीं और माधव पंथ को माननेवाली थीं. वह दसवीं तक भी नहीं पढ़ी थीं, पर स्वाध्याय के जरिये पढ़ना- लिखना जान गयी थीं. वह अंगरेजी अखबार पढ़ लेती थीं और दुनिया भर की खबरों से वाकिफ रहती थीं. उन्होंने मुझे छठी कक्षा तक अध्यात्म और गणित की शिक्षा दी. मेरे पिताजी स्कूल में निरीक्षक थे. मैं इकलौता था, इसलिए मुझे काफी आजादी दी गयी. 1946 में मेरे स्कूल में सर सीवी रमण के दौरे ने मुझे शायद पहली बार विज्ञान के प्रति आकर्षित किया. शिमोगा जिले के शेयाद्री साइंस कॉलेज में दसवीं और बेंगलुरु के सेंट्रल कॉलेज में भौतिकी, रसायनशास्त्र और गणित के साथ बीएससी करते वक्त मेरे मन में वैज्ञानिक बनने की चाह पैदा हुई. रसायनशास्त्र की तुलना में भौतिकी में मेरे ज्यादा नंबर आते थे. मेडिकल या सिविल सेवा में जाने की बजाय मैंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से परास्नातक करने का फैसला किया.

* प्रश्न: बनारस ही क्यों?

राव: क्योंकि उस वक्त बीएचयू ही उन जगहों में था, जहां आप थिसिस करने के साथ-साथ पसंद का एडीशनल कोर्स भी ले सकते थे. बांबे यूनिवर्सिटी में आप सिर्फ थिसिस कार्य ही कर सकते थे. मैं बहुत सारे विषय पढ़ना चाहता था. वर्ष 1950 की शुरुआत में बीएचयू देश का उच्च शिक्षा का केंद्र था. तब वहां नोबेल पुरस्कारप्राप्त वैज्ञानिकों के अलावा कई नामचीन वैज्ञानिक बतौर अतिथि प्रोफेसर पढ़ाने आते थे. एक दिन मुझे लीनस पॉलिंग की लिखी किताब नेचर ऑफ दी केमिकल बांड पढ़ने को मिली. किताब ने जैसे मुझ पर जादू कर दिया. जो उन्होंने लिखा था, वह अनोखा था, उनके कार्य के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था, हालांकि, बाद में उन्हें शांति के लिए भी नोबेल पुरस्कार मिला. मैंने तय किया कि मुझे उनके साथ काम करना है. वर्ष 1953 में एमएससी खत्म करने के बाद मैं बेंगलुरु वापस आ गया. यहां इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में कुछ हफ्ते बिताने के बाद मैं पश्चिम बंगाल में आइआइटी,खड़गपुर चला गया. साल भर में ही मुझे लगने लगा कि खड़गपुर वह जगह नहीं है, जहां मैं आण्विक संरचनाओं के बारे में काम कर सकूं.

मैंने लीनस पॉलिंग को पत्र लिखा कि मैं उनके मातहत डॉक्टरेट करना चाहता हूं. उन्होंने सकारात्मक जवाब दिया. उनके एक छात्र ने मुझे अपने साथ फेलोशिप करने का प्रस्ताव दिया. मेरे पास अमेरिका की पेन्न स्टेट और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की फेलोशिप थी, पर मैं पॉलिंग के छात्र के साथ काम करने के लिए पुरड्यू चला गया. वह बहुत बेहतर इनसान था, पर दुर्भाग्य से जब मैंने उनके साथ काम करना शुरू किया, तो उन्हें यूनिवर्सिटी का प्रशासनिक कार्य भी थमा दिया गया. इसके चलते वह प्रयोगशाला को बहुत कम वक्त दे पाते थे. मैंने अपना काम जारी रखा. मेरे काम को देख कर वह कहते कि जब तुम अपने काम में इतने बेहतर हो, तो क्यों नहीं दूसरों की मदद करते. उस दौरान मैंने कई पीएचडी छात्रों की मदद की. दरअसल उस समय प्रकाशित होने वाले ज्यादातर रिसर्च पेपरों का मौलिक लेखक मैं ही होता था.

उस वक्त मेरी उम्र महज 23 साल थी और मैं एक विशेष अणु की संरचना पर कार्य कर चुका था. उन दिनों एक बार लीनस पॉलिंग रसायनशास्त्र के लिए बने एक भवन का लोकार्पण करने के लिए यूनिवर्सिटी आये. मैंने उन्हें अपना काम दिखाया. मैंने अणु की दो संरचनाओं पर कार्य किया था, जिस पर पॉलिंग की एक थ्योरी थी. उन्होंने अपनी किताब नेचर ऑफ दी केमिकल बांड के तीसरे संस्करण में मेरे कार्य की सरहना की. इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह था कि पुरदुई में किये कार्य में पीएचडी का हिस्सा बहुत कम था. मुझे दो साल नौ महीने में पीएचडी की उपाधि मिली, पर मैंने स्पैक्ट्रोस्कोपी और फिजिकल ऑरगेनिक कैमिट्री पर अपना कार्य जारी रखा. दरअसल मुझे रसायन शास्त्र में नहीं, रसायन भौतिकी में डिग्री मिली.

साभार: मनीलाइफ

* आइ डेडिकेट दिस अवॉर्ड टू माई मदर

भारतीय क्रिकेट में 24 साल का योगदान देने वाले सचिन ने दुनिया में देश का नाम खासा रोशन किया. दिलचस्प बात यह भी है कि भारत रत्न से सम्मानित होनेवाले सबसे कम उम्र के शलाका पुरुष हैं. क्रि केट के भगवान माने जाने वाले सचिन तेंडुलकर के लिए शुक्र वार को ही खबर आयी थी कि उन्हें देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान से सम्मानित किया जा सकता है. और एक ही दिन बाद राष्ट्रपति भवन से इस संबंध में सूचना जारी हो गयी. तेंडुलकर ने भारत रत्न दिये जाने पर पूरे देश का आभार जताया है. एक मैसेज के जरिये कहा है कि यह सम्मान वह अपनी मां को समर्पित करते हैं. अपने मैसेज में लिखा आइ डेडिकेट दिस अवॉर्ड टू माई मदर. उनके बड़े भाई अजीत तेंडुलकर ने भी कहा कि यह हमारे गौरव का क्षण है.

* बधाइयों का तांता: भारत रत्न सम्मान देने पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत तमाम राजनीतिज्ञों, बॉलीवुड की हस्तियों और कई मौजूदा और पूर्व खिलाड़ियों ने खुशी जतायी है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने टेलीफोन कर सचिन से बात की और बधाई दी. स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने भी सचिन को भारत रत्न देने के फैसले पर खुशी का इजहार किया है. सभी राजनीतिक दलों ने भी सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है. उधर, फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह ने सचिन को सम्मान देने का स्वागत करते हुए मांग भी उठायी है कि हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के योगदान को भुलाना नहीं चाहिए.

* नियमों में किया गया बदलाव

सचिन को देश का सबसे बड़ा सम्मान देने के लिए बकायदा भारत रत्न के नियमों में बदलाव किया गया. वर्ष 2011 में भारत के विश्व कप जीतने के बाद सचिन को यह सम्मान देने की मांग ने जोर पकड़ा, तो केंद्र सरकार ने नियमों में बदलाव की सिफारिश की. इसे बाद में मान लिया गया. इससे पहले भारत रत्न कला, साहित्य, विज्ञान व समाज सेवा के क्षेत्र में श्रेष्ठ योगदान के लिए ही दिया जाता रहा है.

* 2008 में मिला था पद्मभूषण

सचिन को वर्ष 2008 में दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से भी नवाजा गया था. तब भी सचिन देश के पहले खिलाड़ी बने थे. हालांकि उसी वर्ष शतरंज के विश्व चैम्पियन बने विश्वनाथन आनंद को भी पद्मभूषण अलंकरण से सम्मानित किया गया था. इससे पूर्व सचिन को देश के सर्वोच्च खेल सम्मान वर्ष 1994 में अर्जुन अवार्ड, 1998 में राजीव गांधी खेल रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है. 1999 में पद्मश्री सम्मान दिया गया था.

Prabhat Khabar Digital Desk
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