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धैर्य व बलिदान का पर्व है मुहर्रम

लोगों ने कहा, मुहर्रम की दसवीं तारिख है शुभ

इस्लामिक वर्ष का पहला महीना मुहर्रम से होता है शुरू

लोकतंत्र की हिफाजत के लिए इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है ये पर्व

इस्लाम जिंदा होता है हर करबला के बाद

फोटो-14- मुहर्रम पर आकर्षक ताजिया का नजारा.

फोटो-15-मौलाना आसिफुर रहमान

फोटो-16-मौलाना मोसव्वीर आलम नदवी

फोटो-17-,अब्दुल हन्नान प्रखंड प्रमुख अररिया

फोटो-18-अफसाना हसन ,महिला सामाजिक कार्यकर्ता.प्रतिनिधि,अररिया

इस्लामिक वर्ष मुहर्रम के महीने से शुरू होता है व जिलहिज्जा पर खत्म होता है. जबसे अल्लाह ने जमीन व आसमान को बनाया एक साल में महीनों की संख्या 12 रखी गयी है. मुहर्रम अरबी भाषा का एक शब्द है. जिसका मतलब ताजीम यानी बड़ाई व हराम का मतलब अजमत वाला होता है. इस्लामिक साल के चार महीने को हराम यानी अजमत वाला करार दिया गया है. ये चार महीने हैं मुहर्रम, रज्जब, जी कादा व जिल हिज्जा. जि कादा व जिल हिज्जा मुहर्रम व हज के लिए व रज्जब उमराह के लिए. इस महीने में अमन शांति की भंग करने से मना किया गया है. जंग, डाकाजनी आदि कार्यों से रोका गया है. ताकि लोग अल्लाह के घर का हज व उमराह बिना किसी खतरे व शांतिपूर्ण तरीके से कर सके.

लोगों ने कहा, मुहर्रम की दसवीं तारिख है शुभ

मुहर्रम को लेकर अररिया के विभिन्न उलमाओं व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने अपने विचार इस्लामिक नजरिए से दिए हैं. जमीयतुल उलमाए हिंद से जुड़े मौलाना आसीफुर रहमान ने बताया कि मुहर्रम के दसवें दिन को यौमे आशूरा कहा जाता है. ये दिन हमें धैर्य व बलिदान का सबक सिखाता है. इस्लामिक इतिहास के अनुसार अल्लाह ने आकाश-पृथ्वी, पहाड़ व समुंदर को इसी दिन पैदा किया. इसी दिन पहला मनुष्य आदम व हजरत दादी हव्वा को जमीन पर उतारा. दुनिया में पहली बार इसी दिन बारिश हुई. हजरत इब्राहिम व हजरत ईसा मसीह को इसी दिन पैदा किया गया. इसी दिन कयामत भी होगी. मुहर्रम की दसवीं तारीख को बहुत ही शुभ माना जाता है. इसी दिन पैगंबर ए इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब ने नवी ,दसवीं व ग्यारहवीं तारीख को रोजा रखने का आदेश दिया. मोहम्मद साहब के वफात के दसवीं मुहर्रम हिजरी 61 में आपके नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत अपने परिवार के बहत्तर लोगों के साथ सत्य व अहिंसा यानी लोकतंत्र की हिफाजत के लिए व राजतंत्र को रोकने के युद्ध में यजीद की फौज से लड़ते लड़ते अपनी शहादत दे दी,लेकिन सर नही झुकाया और न हार मानी. मौलाना मोसववीर आलम नदवी ने बताया कि इस युद्ध ने पूरी दुनिया को ये संदेश दिया की सत्य की रक्षा के लिए सर झुकाने से बेहतर है सर कटा लेना. करबला के मैदान में यजीद की फौज से लड़ते लड़ते अपनी जान दे दी लेकिन न तो झूके और नहीं कोई समझौता किया. इसीलिए मुहर्रम की दसवीं तारीख का महत्व और भी बढ़ जाता है. अररिया प्रखंड के प्रमुख अब्दुल हन्नान व महिला सामाजिक कार्यक्रम अफसाना हसन ने कहा की इस दिन मातम करना, कपड़े फारना, रोना पिटना, पटाखे छोड़ना किसी भी तरह का खुराफात करना इन तमाम बातों से बचने की जरूरत है. दर असल ये गम का त्योहार है इसे पूरी सादगी के साथ मनाएं. अब्दुल हन्नान ने लोगों से अपील की है की लाठी व तलवार से आत्म रक्षा के लिए कर्तव्य सीखना व सीखना अच्छी बात है इसे हुनर के रूप में लें,एक दूसरे के जान माल की रक्षा करें. वहीं अफसाना हसन ने खास तौर से महिलाओं से कहा की आप इस दिन इबादत में मशगूल रहे,भीड़ का हिस्सा ,मेला व बाजार की रौनक नही बने. इससे समाज में बेपर्दगी और अफरा तफरी का माहौल नही बनने दें.

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