यहां आनेवाले श्रद्धालु कभी निराश नहीं लौटते –जोड़मंसूरचक . सबों की मनोकमानाएं पूरी करती हैं गणपतौल स्थित बड़ी दुर्गा माता. सच्चे मन से जो कोई श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर उनका ध्यान करते हैं उनके सारे कष्ट को दूर करती हैं मां भवानी. यहां मां रक्तदंतिका के रूप में माता की पूजा सालो भर होती है और माता की प्रतिमा का रंग लाल होता है. 18वीं शताब्दी से ही तत्कालीन जमींदार गुरु प्रसाद लाल के द्वारा दान दी गयी जमीन पर मंदिर बना है. पूजा समिति के अध्यक्ष रावणेश्वर मिश्रा ने बताया कि 1972 ई तक दुर्गा मां के मंदिर में बलि प्रदान होता रहा. 1973 से बलि प्रथा समाप्त कर दी गयी. महामारी जैसे बीमारी फैलने को लेकर लोग देवी का कोप मानते हुए दिन-रात पूजा में लीन हो गये. धीरे-धीरे बीमारी स्वत: थम गयी. श्री मिश्रा ने बताया कि 1984 ई मां दुर्गा मंदिर भवन का नया निर्माण करवाते समय जब मिट्टी खुदाई की जा रही थी, तो उसी क्रम में भी मां की एक प्रतिमा मिली. खास बात यह है कि यहां हिंदू के साथ-साथ मुसलिम भाई भी मां की अाराधना करते हैं. 75 वर्षीया महिला सुमित्रा देवी बताती है कि माता ने कई लोगों के कष्ट दूर किया़
यहां आनेवाले श्रद्धालु कभी निराश नहीं लौटते --जोड़
यहां आनेवाले श्रद्धालु कभी निराश नहीं लौटते –जोड़मंसूरचक . सबों की मनोकमानाएं पूरी करती हैं गणपतौल स्थित बड़ी दुर्गा माता. सच्चे मन से जो कोई श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर उनका ध्यान करते हैं उनके सारे कष्ट को दूर करती हैं मां भवानी. यहां मां रक्तदंतिका के रूप में माता की पूजा सालो भर होती है और […]
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