इफ्तार कराने का भी मिलता है सवाब

गोपालगंज : रमजान में मुसलमान भाई-बहन रोजे रखते हैं, नमाज-ए-तरावीह भी पढ़ते हैं. रोजा का मतलब सिर्फभूखे-प्यासे रहना नहीं होता. आंख, कान, जुबान यानी शरीर के हर नफ्स पर काबू करने का नाम रोजा है. रोजा हर बुरे कामों से रोकता है. इसी माहे रमजान में कुरान शरीफ हजरत मोहम्मद साहब पर नाजिल हुई. इस […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | June 28, 2015 8:04 AM
गोपालगंज : रमजान में मुसलमान भाई-बहन रोजे रखते हैं, नमाज-ए-तरावीह भी पढ़ते हैं. रोजा का मतलब सिर्फभूखे-प्यासे रहना नहीं होता. आंख, कान, जुबान यानी शरीर के हर नफ्स पर काबू करने का नाम रोजा है.
रोजा हर बुरे कामों से रोकता है. इसी माहे रमजान में कुरान शरीफ हजरत मोहम्मद साहब पर नाजिल हुई. इस कलाम-ए-पाक में इसलाम की वह हर बात लिखी है, जिससे इसलाम चलता है. इस किताब की कई खासियत है, पहला की इसका कोई लेखक नहीं है और इस पवित्र किताब में आज तक जेर-जबर या नोख्ता तक का बदलाव नहीं मिलेगा. इस अनमोल किताब में जिंदगी के हर पल जीने का सलीका लिखा हुआ है.
इस पाक महीने का कुरान में लिखा है कि रोजा औरत-मर्द सब पर फर्ज है. रमजान में झूठ बोलना भी फांसी के बराबर है. अगर कोई शख्स रोजेदार को इफ्तार कराता है, तो उसे भी उस रोजेदार के बराबर सवाब मिलेगा. वह भी हस्र के दिन बख्शा जायेगा. रोजा तमाम बुराई से बचाता है. रोजा सच्चाई पर चलाता है. रमजान में जो इनसान एक रकात नमाज अदा करता है, उसे 15 सौ रकात नमाज पढ़ने का सबाब मिलता है.
छह साल की जोया रख रही है रोजा
गोपालगंज. माह -ए-रमजान में छह साल की जोया भी रोजा रख कर खुदा की इबादत कर रही है. पिछले दो दिनों से नन्ही जोया रोजा रख रही है. मम्मी-पापा को रोजा रखते देख नन्ही बच्ची ने भी भूखा-प्यासा रहने की जिद ठान ली. जोया की जिद के आगे परिजन भी बेबस है. बिना खाये-पीये नन्ही बच्ची करीब 16 घंटे रोजा रख रही है. पिता मो आसदुल्लाह बताते हैं कि पहले दिन ही जोया ने रोजा रखने की जिद ठान ली. लेकिन, मैंने उसे मना कर दिया. इधर, उसने अपनी मम्मी शहीम से जिद कर दो दिनों से रोजा रख रही है. जोया साथ में इफ्तार कर इबादत भी करती है.