– मूंग फसल उगाने से मिट्टी की बढ़ती है उर्वरता कटिहार कृषि विज्ञान केन्द्र कटिहार में टीएसपी अग्रिम पंक्ति प्रत्यक्षण अंतर्गत मूंग की वैज्ञानिक खेती विषय पर जनजातीय कृषकों के लिए एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया. उद्घाटन वरीय वैज्ञानिक सह प्रधान डॉ राजीव सिंह ने किया. उन्होंने बताया कि मूंग वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करने की क्षमता रखती है. यह कार्य राइजोबियम नामक सहजीवी जीवाणुओं की सहायता से होता है. राइजोबियम जीवाणु, मूंग की जड़ों में गाठों का निर्माण करते हैं. मूंग फसल उगाने से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है. अगली फसल को अतिरिक्त नाइट्रोजन की आवश्यकता कम होती है. यह प्राकृतिक रूप से जैविक उर्वरक का कार्य करती है. उन्होंने बताया कि मूंग की उन्नत प्रभेद शिखा जनजातीय किसानों को अग्रिम पंक्ति प्रत्यक्षण अंतर्गत उपलब्ध कराया जा रहा है. प्रभेद की औसत उपज 11 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. यह किस्म 65 से 70 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. कृषि वैज्ञानिक डॉ सुशील सिंह ने बताया कि मूंग फसल के लिए खेत की तैयारी करते समय खेत की दो से तीन जुताई कर पाटा चला देना चाहिए. जुताई के समय गोबर की सड़ी हुई खाद पांच टन प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए. बुवाई के 24 घंटे पूर्व 2.5 ग्राम फफूंदनाशी दवा जैसे डाईफ़ॉल्टआन अथवा था. बुवाई के ठीक पहले फफूंदनाशी दवा से उपचारित बीजों को रायजोबियम कल्चर एवं पीएसबी से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिए. बुवाई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से मी रखनी चाहिए. कृषि वैज्ञानिक पंकज कुमार ने बताया कि मूंग के खेत में खरपतवार होने पर फसल का खरपतवार से प्रतिस्पर्धा बढ़ती है. इसका प्रतिकूल असर उत्पादन पर पड़ता है. पहली निकाई गुड़ाई बुवाई के 25 से 30 दिनों के भीतर करना चाहिए. रासायनिक विधि से खरपतवार नियंत्रण के लिए पेंडीमेथलीन की तीन लीटर या बासालीन की दो लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के उपरांत अंकुरण के पूर्व छिड़काव करना चाहिए. साथ ही उन्होंने पौध संरक्षण की प्रक्रिया पर भी प्रकाश डाला. इस अवसर पर विभिन्न प्रखंडों से आये 60 महिला एवं पुरुष किसानों ने अपनी सहभागिता दी.
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