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हल तो नहीं है लेकिन जीवित है परंपरा

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वसंत पंचमी के त्योहार पर भी हैं अनोखी परंपरा मधेपुरा. वसंत पंचमी का नाम आते ही रंग, गुलाल और अबीर जेहन में आ जाता है. बंगाल, बिहार और झारखंड में इस दिन माता सरस्वती की पूजा धूमधाम से की जाती है. दूसरी ओर वसंत ऋतु के आगमन पर पूरा गांव समाज उत्सवधर्मी हो जाता है. […]

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वसंत पंचमी के त्योहार पर भी हैं अनोखी परंपरा मधेपुरा. वसंत पंचमी का नाम आते ही रंग, गुलाल और अबीर जेहन में आ जाता है. बंगाल, बिहार और झारखंड में इस दिन माता सरस्वती की पूजा धूमधाम से की जाती है. दूसरी ओर वसंत ऋतु के आगमन पर पूरा गांव समाज उत्सवधर्मी हो जाता है. कहीं-कहीं गांवों के संभ्रांत परिवारों में इस दिन भगवान को अबीर चढ़ा कर होली की शुरुआत करने की परंपरा रही है. कृषि आधारित समाज में किसान और हलवाहा के बीच संबंध का नवीनीकरण होता है. हरवाहा के पूरे परिवार का भोजन किसान के यहां ही होता है. परंपरा के अनुसार इस दिन हलवाहा अपने हल को खेती के लिए साफ-सुथरा कर फिर से तैयार करते हैं. पूरब दिशा की ओर मुंह कर बैल और हल लेकर हलवाहे खड़े होते और किसान स्नान करने के बाद फूल और प्रसाद लेकर हल की पूजा किया करते थे. दरवाजे पर आने के बाद हल के फाड़ को अनाज से पूरी तरह ढक दिया जाता. इसके बाद पांच तरह के अनाज को चढ़ाया जाता. बदलते वक्त के साथ ये परंपराएं लुप्त होती जा रही है. लेकिन जिनके यहां अब भी हल है वहां यह पूजा होती है. हालांकि हलवाहे के परिवार को भोजन कराने की परंपरा अब भी जीवित है.

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