कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे

मधुबनी : मधेपुर के जानकीनगर की छोटकी देवी की आंखों से झड़झड़ आंसू बह रहे थे. आस पास की महिलाएं उसे दूर से ही बोल भरोस दे रही थी. पर कोई कब तक बोल भरोस दे पाती और झूठी दिलासा भी कब तक दिलाती. धीरे धीरे सभी महिलाएं अपने अपने घर या काम को चली […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |

मधुबनी : मधेपुर के जानकीनगर की छोटकी देवी की आंखों से झड़झड़ आंसू बह रहे थे. आस पास की महिलाएं उसे दूर से ही बोल भरोस दे रही थी. पर कोई कब तक बोल भरोस दे पाती और झूठी दिलासा भी कब तक दिलाती. धीरे धीरे सभी महिलाएं अपने अपने घर या काम को चली जाती. पर छोटकी देवी अपने छोटे से बच्चे को पकड़े घर से सामान खोजने में जुटी थी.

छोटकी देवी का यह तालाब में तब्दील घर कल तक तो ऐसा न था. घर भले ही फूस का था, पर साफ सुथरा, पेंड़ घर के बाहर में होने के कारण हमेशा ही दो चार आदमी इसके घर के पास बैठ जाते.

हर राहगीर का मानों यह ठहराव ही था. पर शायद छोटकी के इस हरे भरे संसार पर मानों किसी की नजर लग गयी. बीते दिनों आये बाढ़ में पलक झपकते ही न सिर्फ घर में पानी घुस गया. बल्कि तेज धारा में घर में इतनी गहरी मोईन (गढा) हो गया कि सालों की मेहनत से तिनके तिनके जोड़ कर बनाया गया घर, पेट काटकर जुटाया गया सामान भी इसी मोइन में चला गया.

अब तो खाने पीने की बात कौन करे घर में ऐसा कुछ नहीं बचा जिसे वह अपने काम में ला सके. गरीब परिवार से है. जिस प्रकार से घर में गढा या पूरे आंगन, बाड़ी से मिट्टी पानी में कट कर पानी में चली गयी. वह जल्द घर भी नहीं बना सकेगी. रोते हुए ही बताती है कि बाबू सब आदमी घरे में सूतल छली. बलू एक्के बेर पइन अइलइ आ सामान सब पइन में भर भरा का गिरे लगलई. हम आउर जान बचा क भगली. थोरबे काल में कोइ कहलक जे घरों गिर गेल हौ. अईली त पूरा घर गिरल रहे.
पहिले त भेल जे बलू समान सब बचल होत. लेकिन जखनी पईन कम होलई आ घर देखई के लेल अईली त कपारे पीटे लगली. दईबा के नै जाईन कोन अपराध केले रहियै. बड़का मोइन कोइर देलकै. ओही में सबटा समान भसल हइ. आब कोना घर बनतै आ कोना समान सब होते से ने सुझाई है. यह कहती हुई वह मोइन में घुस घुस कर सामान तलाशने की कोशिश करती.
पर कुछ बचा हो तब न उसे मिलता. इसी दौरान उसके हाथ एक दाल बनाने वाला जांता (चक्की) आया. लगा जैसे कुछ अमूल्य सामान हाथ लग गया. मुरझाये चेहरे पर थोड़ी हंसी आयी. उसे मेहनत से बाहर निकलाने में जुट गयी. यह क्रम दिन भर चलता रहा. पर इसी प्रकार के छोटे मोटे ठोस वस्तु ही हाथ आयी. छोटकी बताती है साल 87 में आयी बाढ में भी इतनी क्षति नहीं हुआ था. इस साल तो संभलने का मौका भी नहीं मिला. यह किसी एक छोटकी के साथ नहीं हुआ था. गांव के कई लोगों की कहानी छोटकी की तरह ही है.
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