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महाभूकंप : प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से बढ़ती है विनाशलीला

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शैलेंद्र मुजफ्फरपुर : वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा का कहना है कि पृथ्वी की सतह पर हो रहे बदलावों का भूकंप से कोई मतलब नहीं लगता है, क्योंकि अभी तक जो भी बदलाव हो रहे हैं, वो बहुत सतही हैं. इनका उन सिसमिक प्लेटों से कोई मतलब नहीं है, जो सैकड़ों मील जमीन के अंदर […]

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मुजफ्फरपुर : वरिष्ठ समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्हा का कहना है कि पृथ्वी की सतह पर हो रहे बदलावों का भूकंप से कोई मतलब नहीं लगता है, क्योंकि अभी तक जो भी बदलाव हो रहे हैं, वो बहुत सतही हैं. इनका उन सिसमिक प्लेटों से कोई मतलब नहीं है, जो सैकड़ों मील जमीन के अंदर हैं. बदलावों का असर जमीन के ऊपरी सतह पर ही होता है, जबकि इनके व सिसमिक प्लेटों के बीच तमाम तरह की अन्य चीजें हैं.

श्री सच्चिदानंद सिंहा ने कहा कि हमने इनसाइक्लोपीडिया के माध्यम से इसका अध्ययन करने की कोशिश की है, लेकिन उसमें कोई भी ऐसी बात नहीं है, जिससे ये हो कि बाहरी बदलावों का असर भूकंप पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि भूकंप के बाद होनेवाली तबाही को जरूर ये बदलाव और बढ़ा देते हैं. जैसे नदियों पर जो डैम आदि बनते हैं, अगर भूकंप के असर से उनमें दरार आयी, तो बड़ी तबाही का कारण बन सकते हैं.

श्री सिन्हा ने कहा कि इसको उत्तराखंड में आये जल प्रलय के जरिये समझा जा सकता है, वहां पर पहाड़ों में पानी के बहाव को रोकनेवाले प्राकृतिक चीजों को नष्ट कर दिया गया था. इस वजह से पानी का बहाव आया और सब चीजें नष्ट हो गयीं. इनमें वो तमाम हाइड्रिल पावर स्टेशन भी थे, जिन्हें प्रकृति से छेड़छाड़ करके बनाया गया था, लेकिन भूकंप के मामले में ऐसा नहीं है, क्योंकि जिन प्लेटों के टकराव के कारण भूकंप आता है, उनमें किसी तरह की छेड़छाड़ संभव नहीं लगती है. साथ ही अभी तक जानने की तकनीक नहीं विकसित हो सकी है, जिससे ये पता चल सके कि भूकंप कब और क्यों आयेगा? अभी ये तकनीक विकसित होनी है. इसलिए भूकंप के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है.

श्री सिन्हा ने कहा कि हमने प्रकृति और पर्यावरण की बात है, लेकिन भूकंप को इससे जोड़ना हमारे हिसाब से ठीक नहीं होगा. उन्होंने कहा कि प्रकृति का मामला बिल्कुल अलग है. उन्होंने कहा कि इस बार जो भूकंप के झटके आ रहे हैं, वो 1934 में आये भूकंप के बाद सबसे जबरदस्त हैं.

हम लड़खड़ाये, गिर गये थे मकान

1934 में आये भूकंप की याद सच्चिदाबाबू के जेहन में आज भी ताजा है. वो बताते हैं कि उस समय मेरी उम्र पांच साल की थी. हम अपने मामा के यहां पूर्वी चंपारण में थे, दिन में हम धनुष बाण खेल रहे थे. इसी घर के बाहर थे. इसी दौरान हमारे कदम लड़खड़ाने लगे, तब हमें किसी व्यक्ति ने उठा लिया. इसके बाद देखते ही देखते आसपास के सब घरों के ईंटे गिरने लगीं. जमीन फट गयी, जिससे मिट्टी के साथ पानी निकलने लगा. लोग चारों ओर भागने लगे. वो कहते हैं, उस समय सब लोग फूस की झोपड़ी बना कर महीनों रहे थे. हमारे मामा के गांव में संपन्न परिवार थे. सभी घर गिर गये थे. वो कहते हैं, इससे ज्यादा मुङो याद नहीं है, क्योंकि उस समय उम्र कम थी.

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