कब साकार होगा रेल कारखाने का सपना

अपनी पीठ थपथपाने में लगे जनप्रतिनिधि 140 करोड़ रुपये में हुई थी 220 एकड़ भूमि की बिक्री उद्योग समूह के कबाड़ को बेचने से ही रेलवे को मिल सकता हैं सौ करोड़ से अधिक रुपये डेहरी कार्यालय : रोहतास उद्योग समूह वैसे तो 1985 में ही बंद हो गया था़ लेकिन, बीच-बीच में सरकार की […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
अपनी पीठ थपथपाने में लगे जनप्रतिनिधि
140 करोड़ रुपये में हुई थी 220 एकड़ भूमि की बिक्री
उद्योग समूह के कबाड़ को बेचने से ही रेलवे को मिल सकता हैं सौ करोड़ से अधिक रुपये
डेहरी कार्यालय : रोहतास उद्योग समूह वैसे तो 1985 में ही बंद हो गया था़ लेकिन, बीच-बीच में सरकार की पहल से एक-दो कारखाने खुलते रहे. 1995 में यह उद्योग समूह पूर्ण रूप से बंद हो गया. वर्ष 2007 में जब रेलवे ने रोहतास उद्योग समूह की भूमि सहित खरीद लिया, तो उस समय लोगों के मन में एक आस जगी कि रेलवे यहां कोई कारखाना लगायेगा. रेलवे के तरफ से भी उस समय कहा गया था कि रोहतास उद्योग समूह की जमीन में कोई कारखाना खोला जायेगा या फिर खुद वह अपना कारखाना लगायेगी. उस समय लोगों ने सोचा था कि कुछ वर्ष में कारखाना खुलेगा और हजारों हाथों को काम मिलेगा. लेकिन, आज करीब नौ साल बाद भी कुछ होता दिखाई नहीं देने पर यहां के लोग निराश होने लगे हैं.
रेलवे का उद्देश्य: कबाड़ियों के हाथों बिक रहे रोहतास उद्योग समूह की संपत्ति को खरीदने के पीछे रेलवे का उद्देश्य था कि उक्त भूमि पर रेलवे बैगन, रिपेयरिंग या अन्य कोई प्रोडक्ट की फैक्टरी डालना. इससे रेलवे को ग्रैड कार्ड सेक्शन पर फैक्टरी होने से सामान की ढुलाई में सहूलियत होगी. रेल मुख्यालय से काफी करीब होने से उसका देख रेख करना आसान होगा.
रेलवे को लगभग मुफ्त मिली जमीन : रेलवे द्वारा किसी अन्य सौदों में रोहतास उद्योग समूह का सौदा रहा है. मात्र 140 करोड़ रुपये में 220 एकड़ भूमि व उसके साथ कई कारखानों की मशीनें मिल गयी. जिसे अगर कबाड़ में बेचा जाये, तो रेलवे को 100 करोड़ रुपये मिल सकते हैं.
जिससे खरीद में लगे रुपये का बड़ा हिस्सा मिल सकता है.निराश हो रहे लोग : अधिकारियों द्वारा कई बार दौरा करने से और चुनाव के दौरान नेताओं के बोल से लगा था कि जल्द ही कारखाना खुलेगा. लेकिन, ऐसा होता अब नहीं दिखने पर लोग निराश होने लगे हैं. इंद्र कुमार, विनोद गुप्ता, नागेश्वर, देवेंद्र गुप्ता आदि ने कहा कि कारखाना खुलने की आस में हम आज भी हैं. कोई कारखाना खोलता, तो फिर शहर की रौनक बढ़ जाती.
डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

👤 By Prabhat Khabar Digital Desk

Prabhat Khabar Digital Desk

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >