ब्रज से अलबेली है सहरसा के बनगांव की होली, नंग-धड़ंग रूप धारण किये सड़क पर कल निकलेगा लोगों का हुजूम

सहरसा : कौन हिंदू, कौन मुस्लिम, हजारों की भीड़ में एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर रंग का जश्न मनाते लोगों की टोली को देखना है तो बुधवार को जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बनगांव आना होगा. बनगांव की होली ब्रज की होली की तरह मनायी जाती है. बूढे, जवान या […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
सहरसा : कौन हिंदू, कौन मुस्लिम, हजारों की भीड़ में एक-दूसरे के कंधे पर सवार होकर रंग का जश्न मनाते लोगों की टोली को देखना है तो बुधवार को जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित बनगांव आना होगा. बनगांव की होली ब्रज की होली की तरह मनायी जाती है. बूढे, जवान या बच्चे में कोई भेद नहीं रहता है ओर न रंग का न वर्ण का और न ही उम्र का.
रंगीन पानी के फव्वारे के नीचे एक दूसरे को पछाड़ने की होड़ में सभी व्यस्त रहते है. लेकिन इस पछाड़ में भी प्यार रहता है. अलग-अलग चौक चौराहों पर लोगों की टोली जमा होती है और कारवां बढ़ता जाता है. जो शाम होने से पहले देवी स्थान पर जमा होकर रात तक रंग व होली की मस्ती में सब सराबोर होते रहते हैं.
बनगांव का भगवती स्थान हो या ललित झा बंगला, सभी जगहों का जीवंत दृश्य पूरे सूबे में मनायी जाने वाली होली और बनगांव के फगुआ को विशिष्ट बनाती है. बनगांव में धार्मिक रूप से होली मनाई जाती है. जिसमें संत लक्ष्मीनाथ कुटी, विषहरी स्थान, भगवती स्थान, ठाकुड़बारी में लोगों के हुजूम का पहुंचना काफी महत्वपूर्ण है.
भगवती स्थान में जमा होकर बनने वाली मानव शृंखला का अद्भुत नजारा एवं उसमें शामिल लोगों का उत्साह ब्रज की होली की तरह ही बनगांव की होली को स्थापित करता है. भगवती स्थान में जुटने से पहले गावं के पछवारी टोला एवं दक्षिणवारी टोला का मिलन राजा मनसाराम खां के दरवाजे से विषहरी स्थान के बीच होता है. उसी तरह पुवारी टोला एवं रामपुर बंगला के बीच भी लोगों का मिलन होता है.
लोक देवता संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने किया था प्रारूप में बदलाव: ढोल, मृदंग की धुन पर उमंगों में सराबोर शाम होते ही बनगांव के विभिन्न टोले में युवाओं की टोली होली गीत गाकर माहौल को भक्ति के रंग में रंगने का काम कर रहे हैं.
हालांकि गांव में प्रवेश करने के साथ ही आपका वास्ता गगनचुंबी इमारतों से पड़ेगा, लेकिन होली गीत के बार-बार दोहराये जाने वाले शब्द लक्ष्मीपति हो तो समझिए कि आप निश्चि›त रूप से सहरसा जिला मुख्यालय से आठ किमी पश्चि›म बनगांव पहुंच गये हैं.
जहां की आबादी वैज्ञानिक युग के अनुसार विकास के पथ पर प्रगति कर रही है तो मिथिलांचल की सभ्यता व संस्कृति आज भी रहने वाले सभी लोगों के सीने में कुलांचे भर रही हैं. चाहे फिर घर की चहारदिवारी में ठिठोली करती महिलाओं की मस्ती, होली के रंग व उल्लास में रम रहे युवा हो सभी ब्रज की होली की तरह पारंपरिक रूप से मनायी जाने वाली बनगांव की होली की परंपरा कायम रखे हुए है.
अद्भुत व मनोरम होता है दृश्य
अमूमन जिले के सभी क्षेत्रों में रंगों का यह पर्व मनाया जाता है. लेकिन बनगांव में मनाई जाने वाली होली सूबे में ब्रज की होली की तरह ही अपनी पहचान बना चुकी है. ग्रामीण बताते है कि द्वापर युग से ही बनगांव में होली की परंपरा रही है.
वर्तमान में खेले जाने वाले होली का स्वरूप संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं के द्वारा तय किया गया था. जिसमें गांव के पांच बंगला (दरवाजा) को चिह्नित किया गया था. इसमें गांव के रामपुर बंगला, संतोखरी बंगला, डिहली बंगला, मंजुरी खां बंगला व विषहरी स्थान बंगला शामिल है.
इन बंगलों पर संबंधित टोला (मोहल्ला) के लोग जमा होकर ऊंची शृंखला बनाते है. इस दौरान संत लक्ष्मीपति रचित भजनों को गाते रहते हैं. अमूमन प्रत्येक बंगलों पर इसी प्रकार उत्सव मनाया जाता है. होली के दिन गांव के पांचों बंगलों पर होली खेलने के बाद सभी ग्रामीण जैर (रैला) की शक्ल में भगवती स्थान पहुंच गांव की सबसे ऊंची मानव शृंखला बनाते हैं. ग्रामीण बताते हैं कि नंग-धड़ंग अवस्था में पानी की फुहार के बीच एक दूसरे से गले मिल अटखेली करते लोगों को देखने आने वाले दर्शकों की भीड़ हजारों में होती है.
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