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बेटा अधिकारी, पोता विदेश में सेवारत

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By Prabhat Khabar Digital Desk | November 28, 2016 6:17 AM

मां भूखे व गंदे कपड़े में सदर अस्पताल में काट रही िजंदगी

प्रभात एक्सक्लूसिव
सहरसा : मां सबसे ज्यादा प्यारी होती हैं. हम सब की राज दुलारी होती हैं. हम दुनिया में किसी भी चीज का कर्ज उतार सकते हैं, लेकिन मां का कर्ज नहीं. मां इतनी अनमोल होती हैं कि उसके प्यार को किसी भी और चीज से तोल पाना अपने आप में बेवकूफी होगी. खुशकिस्मत होते हैं वो लोग जिनकी मां होती हैं. लेकिन, यह कहानी एक ऐसी मां की जिसे ईश्वर ने पति-पुत्र व पौत्र जैसी सभी रत्नों से पूर्ण करने
मां भूखे व…
के बावजूद दुनिया में अकेला छोड़ दिया है. लगभग अस्सी वर्षीया विंधेश्वरी देवी पति गदाधर कुवंर जिले के सत्तरकटैया प्रखंड के सिहौल गांव की रहनेवाली है. पुत्र बीसीसीएल में अधिकारी है. पौत्र अभिषेक व नीरज विदेश में अपनी सेवा दे रहे हैं. इसके बावजूद विंधेश्वरी देवी विगत चार साल से सदर अस्पताल के बेड नंबर चार को अपना घर मान जीवन बसर कर रही है. बुजुर्ग महिला अपनी बेबसी की कहानी कहते रुआंसी हो जाती है. इन चार वर्षों में परिवार का कोई सदस्य उन्हें देखने भी नहीं आया है. अस्पताल के डॉक्टर व कर्मियों की मेहरबानी पर माता जी पल-पल अपनों को देखने के लिए रो रही है.
चार वर्ष पहले हुई थी भरती :
शहर की सड़कों पर भटकती इस बुजुर्ग महिला को बीमार अवस्था में देख स्थानीय लोगों ने चार वर्ष पूर्व सदर अस्पताल में भरती कराया था. इसके बाद महिला का इलाज लगातार सरकारी खर्च व स्थानीय लोगों की मदद से की जाने लगी, लेकिन इन वर्षों में परिवार का कोई सदस्य विंधेश्वरी देवी को देखने तक नहीं आया. पीड़िता बताती हैं कि बेटा प्रमोद कुंवर बीसीसीएल में अधिकारी है. पहले धनबाद में पोस्टेड था, लेकिन इन दिनों सपरिवार नागपुर में रह रहा है. पति भी बेटे के साथ ही रहते हैं.
बनगांव है पीड़िता का मायका :
सदर अस्पताल के बेड नंबर चार पर भरती पीड़िता बताती है कि कोई देखनेवाला नहीं है. उन्होंने बताया कि बनगांव पोस्टऑफिस के समीप उनके पिता का घर है. वह बताती हैं कि भाई पंडित सुरेंद्र मिश्र है, जिनका निधन हो चुका है. हालांकि मायका में भतीजा पंडित चुन्नू बाबू व उनका परिवार रहता है, लेकिन कोई सुधि लेने नहीं आया है.
भूख लगती हैं, तो रो लेती हूं :
पीड़िता ने बताया कि अस्पताल में जब मरीजों के लिए खाना दिया जाता है, तो उसी कतार में लग कर ले लेती हूं. लेकिन, कभी नहीं मिलने पर भूखे ही रहना पड़ता है. उन्होंने बताया कि भूख जब बहुत लगती है, तो रोने लगती हूं. सबका बेटा अपने मां-बाप को लेकर अस्पताल आते हैं, लेकिन मैं रोज सवेरे अस्पताल के गेट पर बैठ अपनों का इंतजार करती रहती हूं.
दूय हाथ कपड़ा देबे बौआ:
सदर अस्पताल में महिला को अकेले देख जब कोई व्यक्ति उनसे बात करता है, तो वह फफक कर रोने लगती है. वह मौजूद लोगों से दो हाथ कपड़ा, साड़ी देने की गुहार लगाने लगती हैं. मैले कुचले कपड़ों से स्वयं को ढंक बूढ़ी मां अब भी इस हालत में अपने बच्चों के सलामती के लिए समीप के मंदिर में पूजा करने जाती हैं.
एक कंबल के सहारे गुजरती रात :
इन दिनों ठंड भी दस्तक दे चुकी है. पीड़िता अस्पताल के बेड पर कभी साड़ी, तो कभी कंबल बिछा कर सोती है. वह बताती है कि रात में ठंड लगने पर उसी कंबल को ओढ़ भी लेती हूं. वह बताती है कि बेटा बड़ा अधिकारी है. उसके घर में बहुत कंबल है. कभी आयेगा, तो मेरे लिए कंबल जरूर लेकर आयेगा. इसी उम्मीद पर यह बुजुर्ग महिला अस्पताल में रह रही है.
चार साल से सदर अस्पताल में भरती
एक बुजुर्ग महिला काफी दिनों से अस्पताल में रह रही है. मानवता के नाते उन्हें रहने व भोजन की सुविधा दी जा रही है. उनके घर के लोगों से संपर्क की कोशिश की गयी, लेकिन कोई जानकारी प्राप्त नहीं हुई है. अस्पताल के सभी कर्मी उन्हें दादी कह कर बुलाते हैं.
क्या कहते हैं लोग :स्थानीय युवा रौशन कुवंर ने बताया कि गांव में विंधेश्वरी देवी को अकेला छोड़ सभी लोग चले गये. शुरुआती दिनों में कभी कभार खोज खबर लेते रहते थे, लेकिन इन चार वर्षों में कोई देखने भी नहीं आया है.

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