सौ साल पूर्व बनवाया था रामजानकी मंदिर

सरायरंजन : बात करीब 211 वर्ष पुरानी है. गंगापुर के ग्रामीण बताते हैं कि उस वक्त उंचे रसूख वाले लक्ष्मण सिंह हुआ करते थे. इनके देहांत होने के बाद उनकी दो पत्नियां वनवासो कुवंर व राजो कुवंर की आस्था जगी तो उन्होंने मंदिर निर्माण का निर्णय लिया. हजारों रुपये मूल्य की लागत से ईंट-पत्थरों से […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
सरायरंजन : बात करीब 211 वर्ष पुरानी है. गंगापुर के ग्रामीण बताते हैं कि उस वक्त उंचे रसूख वाले लक्ष्मण सिंह हुआ करते थे. इनके देहांत होने के बाद उनकी दो पत्नियां वनवासो कुवंर व राजो कुवंर की आस्था जगी तो उन्होंने मंदिर निर्माण का निर्णय लिया. हजारों रुपये मूल्य की लागत से ईंट-पत्थरों से मंदिर का निर्माण कई वर्षो में पूरा हुआ.
इसके बाद भगवान रामचंद्र, लक्ष्मण और माता जानकी के साथ वीर हनुमान की मूर्ति स्थापित की गयी. शालीग्राम की मूर्तियां भी स्थापित की गयी. इसके बाद पूरी निष्ठा से पूजा अर्चना की जाने लगी.
ग्रामीणों की मानें तो शुरू में मंदिर की देखरेख ग्रामीण पुजारियों से होती रही. फिर भी स्व. लक्ष्मण सिंह के परिवारवालों ने मंदिर के हित में 7 सौ बीघा जमीन भी दे डाली. इसके बाद वर्ष 1987 में गंगापुर कोठी के मैनेजर मोरवा गांव निवासी रामदेव झा ने मुफस्सिल थाना क्षेत्र के पुनास बिदौलिया गांव रामकरण दास के पुत्र राजेंद्र दास व योगेंद्र दास जो मोरवा निवासी डा. शशिभूषण मिश्र के ही रहते थे उन्हें पुजारी के रुप में नियुक्त किया गया. दोनों भाई विकलांग हैं. पुजारी नियुक्त होने के बाद दोनों भाई मंदिर परिसर में ही आकर रहने लगे. पूजा अर्चना के साथ यहां की सारी व्यवस्था इन्हीं दोनों भाइयों के जिम्मे है.
मंदिर की जमीन धीरे धीरे घटती चली गयी. ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1999 में एक दिन अचानक भगवान राम की मूर्ति गिर कर क्षतिग्रस्त हो गयी थी. इसके बाद ग्रामीणों ने निर्णय लिया कि विखंडित हुई मूर्ति को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाय. इसका अनुशरण करते हुए मूर्ति गंगा में प्रवाहित कर दिया गया. इसके बाद आपसी सहयोग से वारणसी से 90 हजार रुपये मूल्य में अष्टधातु की मूर्ति खरीद कर फिर से स्थापित की गयी. शेष मूर्तियां प्राचीन काल की थी. जिसकी कीमत लाखों रुपये में आकी जा रही है.
इन मूर्तियों की लूट हो जाने से आसपास के लोग मायूस हैं. ग्रामीण जल्द से जल्द इस घटना में शामिल अपराधियों की शिनाख्त कर मूर्तियों को वापस कराने के लिए पुलिस पर नजरें टिका रखी है. देखना है पुलिस कब तक इसमें कामयाब होती है. वैसे जिले में मूर्ति चोरी की घटनाओं में बरामदगी का एक दो अपवाद छोड़ दें तो इतिहास नहीं ही है.
पुजारियों को भोजन देते हैं वंशज
मंदिर की जमीन घट जाने के बाद लक्ष्मण सिंह के वंशज ही पुजारियों को भोजन व अन्य खर्च देते हैं.जानकारी के अनुसार लक्ष्मेश्वर प्रसाद सिंह 40 दिन का भोजन देते हैं. इसी तरह रतन प्रसाद सिंह 40 दिन, चंदेश्वर प्रसाद सिंह के छह पुत्र 40 दिन, भैरव प्रसाद सिंह 15 दिन, सुबोध प्रसाद सिंह 22 दिन, विनोद प्रसाद सिंह 23 दिन, जय किशोर प्रसाद सिंह 60 दिन का भोजन उपलब्ध कराते हैं. वहीं विमल किशोर प्रसाद सिंह 60 दिन, मुन्ना प्रसाद सिंह 30 दिन व मनोज प्रसाद सिंह 30 दिन का भोजन उपलब्ध कराते हैं. इस तरह साल भर का भोजन पुजारियों को उपलब्ध हो पाता है.
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