तब स्वतंत्रता संग्राम के लड़ाकों का एक ही था लक्ष्य ''आजादी''

बैरगनिया :प्रखंड के क्षेत्र के आदमवान निवासी स्वतंत्रता सेनानी राजेंद्र प्रसाद सिंह ने आजादी की लड़ाई के बाद देश में स्थापित गणतांत्रिक व्यवस्था व वर्तमान समय में इसके बदलते स्वरूप पर विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि उन्होंने 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया था. उस समय स्वतंत्रता सेनानियों का […]

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बैरगनिया :प्रखंड के क्षेत्र के आदमवान निवासी स्वतंत्रता सेनानी राजेंद्र प्रसाद सिंह ने आजादी की लड़ाई के बाद देश में स्थापित गणतांत्रिक व्यवस्था व वर्तमान समय में इसके बदलते स्वरूप पर विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि उन्होंने 1942 के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भी भाग लिया था.

उस समय स्वतंत्रता सेनानियों का एक ही लक्ष्य था देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराना. लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ व हमारे स्वतंत्रता सेनानी व विद्वान मनीषियों ने रात-दिन के प्रयास के बाद अपने देश मे लोकतांत्रिक संविधान का निर्माण किया.

26 जनवरी 1950 को देश में अपना गणतंत्र लागू हुआ. श्री सिंह बताते हैं कि गणतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद देश के सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं का समाज में अपना अलग महत्व था. सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों की अपनी एक अलग प्रतिष्ठा थी.
आम लोगों को विश्वास था कि सामाजिक कार्यकर्ता ही समाज व देश को सही रास्ते पर ले जा सकते हैं. उस समय के राजनीतिक कार्यकर्ताओं का प्रखंड से लेकर राजधानी तक के सरकारी व गैर सरकारी कार्यालयों में अपना महत्व था.
पदाधिकारी से लेकर कार्यालय के कर्मी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते थे. लेकिन बदलते समय के साथ साथ अब सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं के मान-सम्मान में धीरे-धीरे क्षरण होने लगा.
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