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कर्मयोगी करता है राग का त्याग: स्वामी शिवानंद

कर्मयोगी करता है राग का त्याग: स्वामी शिवानंद फोटो- 1,2कैप्सन – कथा वाचन करते स्वामी व कथा श्रवण करते श्रद्धालु – कर्म योगी करता है राग का त्याग- भक्ति योगी प्राणियों में देखता है परमात्मा- चिन्मयता के सार होने कारण भगवान हैं आनंद कंद- परिवर्तन और अपरिवर्तन दोनों है परमात्मा का स्वरूप- राजा के समीप […]

कर्मयोगी करता है राग का त्याग: स्वामी शिवानंद फोटो- 1,2कैप्सन – कथा वाचन करते स्वामी व कथा श्रवण करते श्रद्धालु – कर्म योगी करता है राग का त्याग- भक्ति योगी प्राणियों में देखता है परमात्मा- चिन्मयता के सार होने कारण भगवान हैं आनंद कंद- परिवर्तन और अपरिवर्तन दोनों है परमात्मा का स्वरूप- राजा के समीप प्रजा के स्वरूप में उपस्थित होते हैं भगवान- सभी गुणों का आश्रय है सगुण- सगुण को भगवान भी मानते हैं समग्रसुपौल मुख्यालय स्थित राधा कृष्ण ठाकुर बाड़ी परिसर में आयोजित श्रीमद भागवत कथा के छठे दिन शुक्रवार को भक्त जनों ने संगीत मय प्रवचन का भर पूर आंनद उठाया. कथा वाचन करने आये स्वामी शिवानंद जी महाराज ने प्रवचन का शुभारंभ ईश्वर भक्ति व स्तुति कर किया. स्वामी जी ने कहा कि ‘वासुदेव: सर्वम् ‘ प्राणी सभी जगहों पर भगवान को तत्व के रूप में देखता है. पर गोपिकाओं का सर्वत्र भगवान को देखना दृष्टिगत होता है. बताया कि गोपिकाओं के आंखों की कनीनिका में भगवान कृष्ण का चित्र अंकित हो गया था. इस कारण उनको सभी जगह कृष्ण ही कृष्ण दिखाई पड़ता था. उदाहरण स्वरूप जैसे कोई व्यक्ति लाल रंग का चश्मा लगा लेता है तो उसे सभी वस्तु लाल ही दिखाई पड़ता है. ठीक इसी प्रकार गोपिकाओं को सभी जगह कृष्ण ही कृष्ण दिखाई पड़ रहा था. जड़ता का कारण है अज्ञानताशिवानंद जी महाराज ने कहा कि ”ययेदं धार्यते जगत” यानी जड़ता जीव दृष्टि में है. जिस कारण अज्ञान ही जड़ता का कारण है. कहा कि राग छोड़ना भी साधन है और जीवों में परमात्मा को देखना भी साधन है. कर्म योगी राग का त्याग करता है. पर भक्ति योगी प्राणियों मंे परमात्मा को देखता है. कहा इस प्रकार से एक की सिद्धि होने से दोनों की सिद्धि हो जाती है. जब तक शरीर के भीतर में आसक्ति रहेगी तब तक राग – द्वेष बना रहेगा साथ ही संसार ही दिखेगा. बताया कि प्राणियों में भीतर समता होते ही वासुदेव सर्वम् दिखने लगेगा. राग मूल में अपने में है, प्राणी पदार्थो में नही. गीता में है राग के पांच स्वरूपस्वामी जी ने बताया कि गीता में राग के रहने के पांच अवस्था दिखाया गया है. जो पदार्थ, इंद्रियां, मन, बुद्धि और अहम् के रूप में है. बताा कि वास्तव में राग अहम् में ही है. पर वह पांचों स्थान पर दिखाई पड़ता है. बताया कि खुद में होने के कारण ही राग प्राणी के पदार्थों में मिलता है. जब खुद में राग नहीं होगा तो सभी जगहों पर भगवान मात्र ही दृष्टिगत रहेंगे. कहा कि राग -द्वेष के कारण ही संसार विकृति है. यदि राग द्वेष ना हो तो यह भगवत्स्वरूप ही है. बताया कि राग हटाने के लिए ही संसार को विकृति कहा गया. जैसे रामायण में भगवान ने कहा है कि ”सातवँ सम मोहिमय जग देखा । मोतें संत अधिक करि लेखा ।।” ऐसे ही संसार चिन्मय है. पर भगवान उससे भी विलक्षण चिन्मयता का सार भी है. जिस कारण उन्हें आनंदकंद भी कहा गया है. साधक करें मर्यादा अनुरूप व्यवहारशिवानंद जी महाराज ने कहा कि साधक को मर्यादा के अनुसार यथा योग्य व्यवहार करना चाहिए. प्राणियों को चाहिए कि वे मर्यादा अनुरुप व्यवहार करते हुए हृदय से भी किसी के बारे में नकारात्मक सोच ना रखें. जीवन में किसी का भी अपमान – तिरस्कार ना करे. बताया कि शक्ति शक्तिमान से अलग नहीं हो सकता. जैसे नख, केश आदि निष्प्राण चीजें हमारे से अलग नहीं हो सकता. जबकि ये हमारा ही स्वरूप होता है. इसी तरह परमात्मा से अलग सत्ता नहीं है. एक अन्य उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार समुद्र के ऊपर लहरंे चल रही होती है. पर भीतर में एक सम शांत समुद्र है. समुद्र के भीतर कोई लहर नहीं है. ऐसे ही संसार उस परमात्मा की लहरें हैं. बताया कि परिवर्तन भी परमात्मा का स्वरूप है और अपरिवर्तन भी. राग मिटाने के हैं दो तरीके महाराज जी ने बताया कि राग दो प्रकार से मिटाया जा सकता है. एक विचार के द्वारा तथा दूसरा करके मिटाना. बताया कि अगर हमारी वासना उपदेश देने की या फिर व्याख्यान देने की है. तो उस वासना को मिटाने के लिए भगवान हमारे सामने अज्ञानी बन कर श्रोता के रूप में आते हैं. कहा कि यदि राजा बन कर शासन करने की वासना है तो भगवान प्रजा बन कर आते हैं. जब तक हमारी दृष्टि में संसार की सत्ता है तब तक यह मानना चाहिए कि संसार परमात्मा का ही स्वरूप है. कहा कि अगर हम संसार की सत्ता ना माने तो एक परमात्मा के सिवाय कुछ नहीं है. कहा कि संसार रूप में वही है और सत्ता रूप में भी वही है. क्योंकि वास्तव में संसार है ही नहीं. जीव दृष्टि से है संसार का भानस्वामी जी ने बताया कि सत से ही असत का भान होता है. कहा कि सत के बिना असत का भान हो ही नहीं सकता. ज्ञानी और परमात्मा की दृष्टि में संसार है ही नहीं, संसार तो जीव की दृष्टि में है. इससे स्पष्ट हो जाता है कि संसार की स्वतंत्र सत्ता है ही नहीं. उन्होंने कहा कि ” सर्व खल्विदं ब्रह्म” में निर्गुण की मुख्यता है तथा असत का निषेध है. पर वासुदेव सर्वम् में सगुण की प्रधानता है और असत को निषेध नहीं बताया गया है. कहा कि सगुण में तो निर्गुण आ सकता है. लेकिन निर्गुण में सगुण नहीं आ सकता. बताया कि सगुण सभी गुणों का आश्रय है. पर वह किसी गुण के आश्रित व गुण से आबद्ध नहीं है. कहा कि भगवान ने भी सगुण को समग्र बताया है.” असंशयं समग्रं माम” समग्र में सगुण- निर्गुण, साकार- निराकार, और जड़- चेतन, सत – असत आदि सब कुछ विद्यमान है. प्रवचन से वातावरण हुआ भक्ति मयराधाकृष्ण ठाकुरबाड़ी में आयोजित श्रीमद भागवत कथा वाचन से आस पास का माहौल भक्ति मय हो उठा. व्यवस्थापक मोहन प्रसाद चौधरी ने बताया कि स्वामी शिवानंद जी महाराज द्वारा प्रस्तुत किये जा रहे संगीतमय कथा प्रवचन का समापन शनिवार को किया जायेगा. श्री चौधरी ने बताया कि महाराज जी के ईश्वर स्तुति, प्रार्थना व संगीतमय वाचन के दौरान श्रद्धालु भक्ति रस में लीन हो रहे हैं. बताया कि स्वामी लालजी महाराज की अगुवाई में हो रहे कथा प्रवचन में देव नारायण चौधरी, सरस्वती देवी, शकुंतला देवी, अभय चौधरी, अजय चौधरी व पूनम देवी का सराहनीय योगदान रहा है. कथा वाचन के उपरांत प्रसाद वितरण भी किया जा रहा है.

Prabhat Khabar Digital Desk
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