1952 में निर्विरोध सरपंच बने थे मनबोध शर्मा

चीरा चास : नावाडीह पंचायत के मनबोध शर्मा 1952 में पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद पहले सरपंच बने. उसके बाद वर्ष 1978 में मुखिया बने, 32 वर्ष के बाद पंचायत चुनाव हुआ तो नावाडीह पंचायत अनुसूचित जाति के लिए सुरिक्षत हो गया. 92 वर्षीय श्री शर्मा कांगेस के वरिष्ठ नेता भी रहे […]

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चीरा चास : नावाडीह पंचायत के मनबोध शर्मा 1952 में पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद पहले सरपंच बने. उसके बाद वर्ष 1978 में मुखिया बने, 32 वर्ष के बाद पंचायत चुनाव हुआ तो नावाडीह पंचायत अनुसूचित जाति के लिए सुरिक्षत हो गया.

92 वर्षीय श्री शर्मा कांगेस के वरिष्ठ नेता भी रहे हैं. और वह भूतपूर्व विधायक हरदयाल शर्मा के काफी करीबी थे, जो स्वतंत्र भारत के पहले विधानसभा चुनाव में मानभूम जिला के अंतर्गत चास चंदनकियारी पाड़ा विधानसभा क्षेत्र से काशीपुर नरेश को हराकर विधायक बने थे. अपने राजनीतिक घटनाक्रम में श्री शर्मा ने कहा : मैं नावाडीह पंचायत से 1952 में निर्विरोध सरपंच चुना गया. उस समय नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए पुरूलिया जाना पड़ता था. उस समय अपने समर्थकों के साथ साइकिल से नामांकन करने पुरूलिया गया था. उसके बाद बिहार बंगाल अलग हुआ. तब से नामांकन धनबाद में नॉमिनेशन होने लगा. बिहार बंगाल विभाजन के आंदोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था.

सरपंच बनना प्रतिष्ठा की बात थी : श्री शर्मा ने कहा उस समय विधायक तो दूर की बात मुखिया सरपंच बनना प्रतिष्ठा की बात थी. पहले और आज के समय में आकाश जमीन का बदलाव आया है. चुनाव में पैसों का जोर आज की तरह नहीं था. लोग इमानदारी से काम करते थे. मेरे कार्यकाल में शैक्षणकि विकास पर जोर दिया गया. तत्कालीन विधायक हरदयाल शर्मा ने चिकिसया में कार्तिक चंद्र शर्मा उच्च विद्यालय की आधारशिला रखी. उनसे प्रेरित होकर हमने निचितपुर, नावाडीह, मूर्तिटांड़ में स्कूल निर्माण कराया. फूड फॉर वर्क चलाया. इसके अलावा पंचायत मे होनेवाली छोटी बड़ी विवादों का निबटारा पंचायत में ही कर लेना, गरीब की बेटी की शादी हो, या किसी आपदा में मदद करने के लिए तत्पर रहते थे. आजकल की तरह सरकार इतना फंड और संसाधन नहीं देती थी, लेकिन समाजसेवा की भावना से ओतप्रोत थे.

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