प्रवचन:::: ज्ञान व भक्तियोग एक ही लक्ष्य तक पहुंंचाते हैं
वास्तव में देखा जाये तो ज्ञान तथा भक्तियोग एक ही अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाते हैं. इस अंतर्सूत्र की जानकारी न होने से दोनों भिन्न लगते हैं. भक्ति को परिपक्व करने तथा ज्ञानयोग को पूर्ण विकसित, संतुलित व तीव्र बनाने के लिए निष्काम कर्मयोग अथवा राजयोग आवश्यक है. इसी द्वैतवाद के अंतर्गत विभिन्न साधना प्रणालियों का […]
By Prabhat Khabar Digital Desk |
April 21, 2015 5:03 PM
वास्तव में देखा जाये तो ज्ञान तथा भक्तियोग एक ही अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाते हैं. इस अंतर्सूत्र की जानकारी न होने से दोनों भिन्न लगते हैं. भक्ति को परिपक्व करने तथा ज्ञानयोग को पूर्ण विकसित, संतुलित व तीव्र बनाने के लिए निष्काम कर्मयोग अथवा राजयोग आवश्यक है. इसी द्वैतवाद के अंतर्गत विभिन्न साधना प्रणालियों का अविष्कार हुआ जिनमें राजयोग व अष्टांग योग भी एक स्वतंत्र, सरल व संतुलित आध्यात्मिक साधना के मार्ग हैं. यह ईश्वर साक्षात्कार का सीधा मार्ग है. अष्टांग योग के प्रवर्तक महर्षि पतंजलि ने इसे आठ सोपानों में विभक्त किया है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि. इस पथ के पथिक के लिए उच्च स्तर की मानसिक स्थिरता तथा पवित्रता आवश्यक है परंतु आजकल बहुत कम लोग इसका सही-सही अनुशीलन कर पाते हैं.
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