सुल्तानगंज से देवघर तक कहीं चेक प्वाइंट नहीं
बिहार-झारखंड के बीच को-ऑर्डिनेशन का अभाव
संजीत मंडल
देवघर : देवघर में भगदड़ की घटना व्यवस्था की चूक है. क्योंकि बिहार और झारखंड के आलाधिकारियों के बीच को-ऑर्डिनेशन का अभाव साफ दिखा है. क्योंकि यदि भीड़ का आकलन सुल्तानगंज से सही-सही मिल जाता तो देवघर प्रशासन उसी अनुरूप तैयारी करती. लेकिन रविवार को कांवरियों का दवाब देर रात तक इतना बढ गया कि इसका आकलन देवघर प्रशासन नहीं कर सकी, जिसका नतीजा सामने है.
बैठकें होती हैं पर अमल नहीं : हर साल भीड़ नियंत्रण के लिए रणनीति बनती है. श्रवणी मेले से पहले हर साल बिहार-झारखंड के आलाधिकारियों के बीच इंटरस्टेट को-ऑर्डिनेशन की बैठकें होती है.
लेकिन जो भी रणनीति बनती है उस पर अमल नहीं होता है. दोनों ही राज्यों के बीच को-ऑर्डिनेशन का अभाव इस घटना से साफ जाहिर हो रहा है. सुल्तानगंज से प्रशासन ने कांवरियों की सही संख्या नहीं उपलब्ध करायी, जिससे भीड़ का दवाब एकाएक बढ गया.
कांवरिया पथ पर कोई चेक प्वाइंट नहीं : सुल्तानगंज से देवघर तक 105 किमी क्षेत्र में कांवरिया पथ पर आज तक बिहार और झारखंड के जिले के संबंधित प्रशासन ने चेक प्वाइंट नहीं बनाया. जिससे कांवरियों की भीड़ को नियंत्रित किया जा सके.
उन्हें बाबा मंदिर के भीड़ के दवाब के बारे में अवगत कराया जा सके.लेकिन को-ऑर्डिनेशन बैठकों में इस तरह की कोई रणनीति आज तक नहीं बनी है. यदि कांवरिया पथ पर ही पांच-छह जगह पर चेक प्वाइंट बनाकर कांवरियों को जागरूक किया जाता, उन्हें भीड़ का हवाला देकर रोकने की व्यवस्था होती तो आज ये घटना नहीं होती.
दवाब के आगे सिस्टम कोलैप्स कर गया : रविवार और सोमवार को हर श्रवणी मेले में भीड़ का दवाब अधिक हो जाता है. हर साल सोमवारी की भीड़ से निबटने के लिए प्रशासन और पुलिस मिलकर रणनीति बनाते हैं. लेकिन भीड़ का आकलन सही तरीके नहीं कर पाने के कारण एकाएक कांवरियों का प्रवाह बढा. कांवरियों की भीड़ के दवाब के आगे तमाम प्रशासनिक व पुलिस का बनाया सिस्टम कोलैप्स कर गया.
भीड़ तो घटना स्थल से लेकर डॉबर ग्राम तक थी ही, बिजली आंख मिचौनी खेल रही थी. इस रूट लाइनिंग में रोशनी का पर्याप्त इंतजाम नहीं था. कोरिडोर में जो बल्व लगाये गये थे, ढिबरी की तरह जल रहे थे. अंधेरे में यह रूट होने के कारण भी कांवरियों की भीड़ सोये कांवरियों को नहीं देख सकी और सभी कुचल गये.
व्यवस्था से बाहर चली गयी भीड़ : प्रशासनिक आंकड़े की ही मानें तो तकरीबन डेढ़ लाख कांवरियो रविवार को कतार में खड़े थे. कतार 10 किमी लंबी हो गयी. प्रशासनिक व्यवस्था बेलाबगान तक ही था. कोरिडोर व पेयजल का इंतजाम भी बेलाबगान तक ही था.
लेकिन कतार डाबर ग्राम यानी तकरीबन 3 से 4 किमी अधिक बढ़ गयी. इस कारण जो प्रशासनिक व्यवस्था थी, उससे बाहर भीड़ चली गयी. अधिक भीड़ के दवाब के कारण कांवरियों के बीच अफरा-तफरी हुई. नौबत भगदड़ तक पहुंच गयी और इतनी बड़ी घटना हुई.
हाथ पर हाथ धरे बैठी रही एनडीआरएफ : आपात स्थिति से निबटने के लिए इस बार भी एनडीआरएफ की कंपनी देवघर में तैनात है. लेकिन आज की इस घटना के बाद राहत कार्य के लिए एनडीआरएफ की कहीं कोई भूमिका नहीं दिखी. बताया जाता है कि इंस्ट्रक्शन के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे एनडीआरएफ बैठी रही.
सिर्फ और सिर्फ शिवगंगा की आपदा को ही रोकने के लिए एनडीआरएफ की टुकड़ी तैनात रही. जबकि मेला से पहले ही मॉक ड्रील हुआ था जिसमें डॉक्टर, एनडीआरएफ, पुलिस फोर्स, प्रशासन व पुलिस के बीच को-ऑर्डिनेशन का पाठ पढ़ाया गया था. लेकिन भगदड़ की घटना में ऐसा कोई को-ऑर्डिनेशन नहीं दिखा.
रैफ के अनुभव से वंचित रहा प्रशासन : पिछले दो बार श्रवणी मेले में भीड़ नियंत्रण कर चुकी रेपिड एक्शन फोर्स के अनुभव का लाभ इस बार देवघर प्रशासन को नहीं मिल सका.
क्योंकि सरकार ने इस बार मेले के दौरान रैफ की जगह सीआरपीएफ की तैनाती कर दी. जबकि रैफ को काउड कंट्रोल के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है. देवघर मेले में उन्हें अच्छा खासा दो बार का अनुभव भी था.
लेकिन अब घटना घटी और दस जानें जाने के बाद सरकार ने सबक ली और दो कंपनी रैफ की प्रतिनियुक्ति देवघर मेले के लिए कर दी है. वहीं पहली बार आयी सीआरपीएफ की तीन अतिरिक्त कंपनी भी भीड़ नियंत्रण में देवघर प्रशासन का सहयोग करेगी.
