कई नेताओं को शून्य से शिखर तक पहुंचाया, आज खुद हाशिये पर

धनबाद: कोयला उद्योग से जुड़े कई मजदूर नेताओं को शून्य से शिखर तक पहुंचाने वाली इंटक आज खुद ही कोयला उद्योग में हाशिये पर पहुंचने के कगार पर आ गयी है. कभी इंटक के बड़े नेता बड़े पद को लेने से नम्रतापूर्वक इनकार कर दिया करते थे. आज पद पाने की एएसी होड़ मची है […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | November 23, 2016 7:52 AM
धनबाद: कोयला उद्योग से जुड़े कई मजदूर नेताओं को शून्य से शिखर तक पहुंचाने वाली इंटक आज खुद ही कोयला उद्योग में हाशिये पर पहुंचने के कगार पर आ गयी है. कभी इंटक के बड़े नेता बड़े पद को लेने से नम्रतापूर्वक इनकार कर दिया करते थे. आज पद पाने की एएसी होड़ मची है कि नेता संगठन को भी हाशिये पर ढकलने में कोताही नहीं बरत रहे हैं. कभी कोयला मजदूरों को संगठित करने एवं उनके वेतन व हक की लड़ाई लड़ने वाली इंटक कोयला मजदूरों के 10वें वेतन समझौता से ही बाहर कर दिया गया. अदालत ने शामिल होने पर ही रोक लगा दी है.
चेयरमैन का पद ठुकराया
वर्ष 1973 में कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण पूरा हो चुका था. कोल इंडिया भी बन चुकी थी. तत्कालीन कोयला मंत्री कुमार मंगलम ने राष्ट्रीय खान मजदूर फेडरेशन और आरसीएमएस के संस्थापक कांति मेहता को बुलाया और कोल इंडिया का चेयरमैन पद संभालने का ऑफर दिया. जैसा की दस्तावेज बताते हैं कांति मेहता ने मजदूरों की सेवा की बात कह कर कोयला मंत्री के ऑफर को विनम्रता पूर्वक ठुकरा दिया था.
और कई भी बने
इंटक के बनाम और बल पर कई विधायक, मंत्री और सांसद भी बने. धनबाद कोयलांचल के ओपी लाल बिहार में दो बार मंत्री रहे. इंटक के वर्तमान राष्ट्रीय महामंत्री राजेंद्र प्रसाद सिंह बिहार और झारखंड में मंत्री बने. ददई दुबे विधायक, मंत्री और धनबाद से सांसद तक बने. मन्नान मलिक भी मंत्री बने. इनसे पहले आरसीएमएस के महामंत्री सिद्धेश्वर प्रसाद सिंह एमएलसी बने उसके बाद मंत्री का दर्जा प्राप्त किया.
इनके बिना इंटक की बात अधूरी
इंटक की बात हो और बीपी सिन्हा का नाम न आये ये संभव नहीं. कोयलांचल के बेताज बादशाह के रूप में ख्याति थी उनकी. राजनीतिक धमक इतनी कि कांग्रेस आलाकमान तक सीधे पहुंच. धनबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस का उम्मीदवार बगैर इनकी अनुमति के तय नहीं होते थे. दो बार एमएलसी मनोनीत किये गये. कई बार राज्य सरकार में मंत्री बनने का ऑफर दिया गया, पर स्वीकार नहीं किया. इनके निधन पर देश की पूर्व प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्षा इंदिरा गांधी ने लिखित रूप से शोक संदेश भिजवाया था. मजदूर संगठनों पर नजर रखने वालों की माने तो इंटक के वर्तमान नेतृत्व ने अपने अतीत से कुछ नहीं सिखा. इसके बड़े नेता कांति मेहता ने 1987 में इंटक के राष्ट्रीय महामंत्री पद से दिये इस्तीफे में ही संगठन में आ रही गिरावट का उल्लेख किया था और लगता है सिखने को तैयार भी नहीं.
सीएम तक बने इंटक नेता
बिंदेश्वरी दुबे के नाम से कौन परिचित नहीं होगा. दो बार केंद्र में मंत्री, बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष के बाद उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री के पद को भी सुशोभित किया. इतनी उचांइयों पर पहुंचने के पहले वह एक सधारण नेता थे और हजारीबाग में एक छोटी सी यूनियन चलाते थे. प्रसिद्ध गांधीवादी इंटक नेता कांति मेहता के संपर्क में आये. फिर उन्होंने अपने संगठन का राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ में विलय कर दिया. इस विलय के साथ ही उनका भविष्य का दरवाजा खुल गया. आरसीएमएस के अध्यक्ष, महामंत्री, राष्ट्रीय खान मजदूर फेडरेशन के अध्यक्ष व इंटक के अध्यक्ष बने. जैसे-जैसे इंटक में उनका कद बढ़ता गया, वैसे-वैसे उनका राजनीतिक कद भी बढ़ता गया. विधायक, बिहार में मंत्री, बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष, बिहार के मुख्यमंत्री, केंद्र में श्रम और कानून मंत्री का पद उन्होंने संभाला.