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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस : कई मुसीबतों को झेल शहर साफ रखती हैं महिला

रोड हो या रेलवे स्टेशन या फिर अस्पताल. एक दिन भी अगर सफाई न हो तो हर ओर अव्यवस्था फैल जाती है. इस अव्यवस्था को फैलने से रोकने की पूरी जिम्मेदारी सफाईकर्मियों पर होती है. इन सफाई कर्मियों में महिला सफाई कर्मियों की भूमिका सबसे अहम हो जाती है.

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धनबाद : रोड हो या रेलवे स्टेशन या फिर अस्पताल. एक दिन भी अगर सफाई न हो तो हर ओर अव्यवस्था फैल जाती है. इस अव्यवस्था को फैलने से रोकने की पूरी जिम्मेदारी सफाईकर्मियों पर होती है. इन सफाई कर्मियों में महिला सफाई कर्मियों की भूमिका सबसे अहम हो जाती है. क्योंकि घर से लेकर बाहर तक वे अपने परिवार का बोझ उठाती हैं.

लेकिन आज स्थिति है कि गंदगी उठाते-उठाते इन महिला सफाई कर्मियों की जिंदगी भी इसी गर्त के नीचे दब सी गयी है. धनबाद के 55 वार्ड वाले नगर निगम में साफ सफाई की जिम्मेदारी करीब 5000 सफाई कर्मी उठाते हैं.

इनमें महिला सफाई कर्मियों की संख्या लगभग दो हजार हैं. इतनी बड़ी संख्या में सफाई कर्मियों की जरूरत अकेला धनबाद जिला पूरा नहीं कर पाता है. बड़ी संख्या में धनबाद के आसपास के जिलों विशेषकर बंगाल के आसनसोल से सफाई कर्मी प्रतिदिन धनबाद आकर कार्य करते हैं . स्वच्छता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम करने के बावजूद, इन सफाईकर्मियोें के जीवन में कई विषमताएं हैं जिसे आज तक दूर करने का प्रयास किसी ने नहीं किया है.

सम्मान से जीने लायक पैसे नहीं मिलते: लक्ष्मी एलसी रोड पर सुबह 7:00 बजे से दोपहर दो बजे तक सड़कों पर झाड़ू लगाने का काम करती है. वह ठेकेदार के अधीन काम करती है. बताती है कि उसे सप्ताह में 6 दिन काम मिल जाता है. लेकिन इतने पैसे नहीं मिलते कि सम्मान की जिंदगी बसर कर सके. वह अपने पति के साथ सफाई का काम करती है. दोनों प्रतिदिन आसनसोल से इस काम के लिए धनबाद आते हैं. दोनों पति-पत्नी पिछले 10 वर्षों से यह काम कर रहे हैं. लेकिन पति शराब पीने में अपनी कमाई खत्म कर देता है. इसलिए घर चलाने और बच्चों को पढ़ाने के लिए उसे काम करना शुरू करना पड़ता है.

लक्ष्मी बताती है यह काम वह मजबूरी में कर रही हैं. पति शराब पीना छोड़ दे तो वह भी यह काम छोड़ दे. अभी वह अपने बच्चों को दूसरों के भरोसे छोड़ कर प्रतिदिन धनबाद आती है. उसके तीन बच्चे हैं. लेकिन उसकी अनुपस्थिति में वे स्कूल जाते हैं कि नहीं जाते इसका उसे पता नहीं चल पाता है. वह चाहती है उन लोगों के बीच में भी नशा मुक्ति के लिए अभियान चले. उसके समाज की सबसे बड़ी दुश्मन यह नशा है.

नशे ने परिवार को किया बर्बाद : केंद्रीय अस्पताल में सफाई का काम करने वाली राधा बताती हैं कि उसके परिवार में वह पहली औरत थी, जिसने बाहर काम करना शुरू किया. परिवार के पूर्व सदस्य अपनी कमाई पूरी तरह शराब में बर्बाद कर देते हैं. ऐसे में अब परिवार चलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है. हालांकि वह बताती है कि उसकी बस्ती में कुछ जागरूक युवक अब उसके बच्चों के उत्थान के लिए कार्य कर रहे हैं. इससे पहले से तो हालात बेहतर हुए हैं. लेकिन अब भी काफी कुछ किया जाना चाहिए.

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