फादर्स डे पर पढ़िए तीन प्रेरणादायक कहानियां: हर पिता में होती है मां

रांची : आज फादर्स डे है. यानी पिता का दिन. पिता अर्थात वह अंगुली, जिसे पकड़कर हम खड़ा होना सीखते हैं. पिता बाहर से कठोर होते हैं, लेकिन अंदर से कोमल. यानी हर पिता में मां (ममता) भी होती है. पिता हम सभी को काबिल बनाते हैं. जिंदगी की सही राह दिखाते है़ं जीवन के […]

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रांची : आज फादर्स डे है. यानी पिता का दिन. पिता अर्थात वह अंगुली, जिसे पकड़कर हम खड़ा होना सीखते हैं. पिता बाहर से कठोर होते हैं, लेकिन अंदर से कोमल. यानी हर पिता में मां (ममता) भी होती है. पिता हम सभी को काबिल बनाते हैं. जिंदगी की सही राह दिखाते है़ं जीवन के कठिन रास्ते पर चलना सिखाते हैं. वे बच्चों के आदर्श होते हैं. बच्चे जो कुछ भी सीखते हैं, वह पिता से ही सीखते है़ं तभी तो उनके जैसा बनना चाहते है़ं आज फादर्स डे पर पढ़िए पूजा सिंह @ रांची की यह रिपोर्ट.

अपने विशेष बेटे के लिए बन गये मां
राजन मिंज, अशोक नगर

अशोक नगर के रहनेवाले राजन मिंज का नौ साल का बेटा है. वे ऑटिस्टिक बच्चे के पिता है़ं आरएमएसडब्ल्यू में सुपरवाइजर राजन अपने बेटे की देखभाल अकेले करते हैं. उनकी शादी 2008 में हुई़ शादी के एक साल बाद ही बेटे का जन्म हुआ़, लेकिन पत्नी से तलाक हो गया. 2011 में दोनों अलग हो गये. तब से अपने बेटे की खुद देखभाल कर रहे हैं. वह कहते हैं कि बेटा एक वर्ष का था, तब मालूम चला कि वह ऑटिस्टिक है़ बोलना तो दूर चल भी नहीं पाता था़ पत्नी बेटे को मेरे पास छोड़ कर चली गयी़ उस समय कुछ समझ में नहीं आ रहा था़ तब मैंने खुद को संभाला और मां बन कर उसे संभालने का फैसला लिया़

गॉड गिफ्ट है मेरा बेटा

श्री मिंज कहते हैं : बेटा मेरे लिए गॉड गिफ्ट है़ उसे पीठ पर बांध कर रात-रात भर घूमाता, ताकि वह सो जाये़ बोल नहीं पाने के कारण कब उसे भूख लगती, कब प्यास इसे समझने में परेशानी जरूर हुई़ हालांकि धीरे-धीरे मैं उसके लिए मां और पापा दोनों बन गया.

जरूरतमंद बच्चों की सेवा के लिए नहीं की शादी
अशोक अग्रवाल, कांके रोड

कांके रोड निवासी अशोक अग्रवाल. उम्र 65 वर्ष, लेकिन अभी तक शादी नहीं की. बच्चों में बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं. अनाथ और आर्थिक स्थिति से कमजोर बच्चों का सहारा हैं. इन बच्चों को घर में लाकर पढ़ाते हैं. रहने और खाने-पीने का भी खर्च उठाते हैं. अशोक अग्रवाल के माता-पिता और पांच भाई-बहन दिल्ली में रहते है़ं श्री अग्रवाल सूचना प्रसारण मंत्रालय में सेवा दे रहे थे. नौकरी छोड़ दी और रांची आ गये. समाज सेवा से जुड़ गये़ वह कहते हैं कि शुरू से ही समाज सेवा करने की इच्छा रही है. इसलिए कभी शादी नहीं की़ शादी करते, तो जिम्मेदारी आती. फिर नौकरी करनी पड़ती़ माता-पिता से आज्ञा लेकर दूसरों का जीवन संवारने में लगे गये़

बच्चों को शिक्षा देना ही जीवन का लक्ष्य

श्री अग्रवाल रांची में अपने चार कमरों के घर में रहते हैं. जो बच्चे आर्थिक स्थिति के कारण पढ़ नहीं पाते थे, तो उन्हें अपने पास रखा. पढ़ाया-लिखाया. अभी तीन बच्चियों को पढ़ा रहे हैं. उनकी देखभाल के लिए एक वृद्धा महिला भी हैं. अभी तक 13 बच्चों की पढ़ाई पूरी करा चुके हैं.

दोनों बेटों के लिए छोड़ दी नौकरी
सुनील सिंह, पंचवटी गार्डेन

पंचवटी गार्डेन निवासी सुनील कुमार सिंह के दो बेटे है़ं बड़ा बेटा रौनक और छोटा बेटा उत्सव. पत्नी का निधन 2009 में एक दुर्घटना में हो गया. उस समय छोटा बेटा सिर्फ डेढ़ वर्ष का था. उत्सव कहते हैं : पापा ने हमें कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी़ मां और पापा दोनों का प्यार दिया़ पालन-पोषण के लिए नौकरी तक छोड़ दी़ मेरे स्कूल जाने तक कोई काम नहीं किया़ आज बड़ा भाई आइआइटी कानपुर से पढ़ाई करने के बाद अब्बूधाबी में नौकरी करने जा रहा है़

पापा में ही मां भी दिखती है

उत्सव कहते हैं : मुझे पापा में ही मां भी नजर आती है़ भाई के जाने के बाद मैं भी पढ़ाई के लिए बाहर चला जाऊंगा. इसलिए दाेनों भाइयों ने मिल कर छह महीने पहले पापा की शादी करायी. पिता सुनील सिंह ने कहा कि पत्नी रंजना सिंह के अचानक चले जाने के बाद उनकी कमी तो पूरी नहीं कर पाया, लेकिन बच्चों को उनके हिस्से का प्यार देने की पूरी कोशिश की़ पत्नी का निधन मेरे लिए जीवन का सबसे कठिन समय था.

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