रांची : हुजूर! जुर्माना तो वसूल रहे हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम भी थोड़ा सुधार लेते

क्या करें! अपनी गाड़ी से चलें, तो भारी जुर्माने का डर, दूसरे साधनों का भगवान ही मालिक रांची : एक सितंबर से ट्रैफिक के नये नियम लागू हो चुके हैं. ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन करनेवाले वाहन चालकों पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है. नये नियमों को लेकर पुलिस-प्रशासन भी रेस हैं. चौक-चौराहों में जोर-शोर […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
क्या करें! अपनी गाड़ी से चलें, तो भारी जुर्माने का डर, दूसरे साधनों का भगवान ही मालिक
रांची : एक सितंबर से ट्रैफिक के नये नियम लागू हो चुके हैं. ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन करनेवाले वाहन चालकों पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है.
नये नियमों को लेकर पुलिस-प्रशासन भी रेस हैं. चौक-चौराहों में जोर-शोर से वाहनों की चेकिंग की जा रही है. इससे लोगों में दहशत है. जिन लोगों की गाड़ी के पेपर आधे-अधूरे हैं या जिनके पास ड्राइविंग लाइसेंस आदि नहीं है, वे तो सड़क पर वाहन लेकर निकलने से भी कतरा रहे हैं. इसका असर भी गुरुवार को शहर की सड़कों पर दिखा.
सड़कों पर स्कूली बस, ऑटो व ई-रिक्शा तो नजर आ रहे थे, लेकिन बाइक की संख्या आम दिनों की तुलना में काफी कम थी. इधर, ट्रैफिक के नये नियमों के लागू होने और विकल्प के रूप में किसी प्रकार की व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं दिये जाने से लोगों में काफी आक्रोश है.
लोगों का कहना था कि सरकार अगर शहर के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को दुरुस्त करती और यातायात व्यवस्था को सुगम बनाती, तो आज इतनी संख्या में लोग मोटरसाइकिलें और कारें लेकर सड़कों पर निकलते ही नहीं. इससे लोगों को भारी-भरकम जुर्माना भी नहीं भरना पड़ता.
यह हाल है शहर के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का शहर के पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को दुरुस्त करने के लिए राज्य सरकार ने नगर निगम को 91 सिटी बसें दी हैं. लेकिन इनमें से 41 सिटी बसों का परिचालन केवल दो सड़कों (अलबर्ट एक्का चौक से राजेंद्र चौक, कचहरी से लेकर बिरसा चौक) तक में हो रहा है.
कचहरी, रातू रोड, कचहरी से कांके रोड, बरियातू रोड, अलबर्ट एक्का चौक से कोकर चौक, कांटाटोली से बूटी मोड़, हरमू रोड, बिरसा चौक से धुर्वा, हटिया आदि क्षेत्रों के लोगों काे इसका लाभ नहीं मिल रहा है.
स्टेशन में उतरने वाले रोज लूटे जा रहे
रांची स्टेशन पर प्रतिदिन 20 हजार से अधिक लोग उतरते हैं. लेकिन यहां भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का कोई साधन नहीं है. यहां उतरने वाले लोग पूरी तरह ऑटो पर आश्रित हैं. आॅटो चालक भी इन यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए मनमाना किराया लेते हैं. सबसे अधिक परेशानी रात नौ बजे के बाद स्टेशन पर उतरे यात्रियों को हाेती है.
ट्रैफिक सुधार के लिए इन पर हो अमल
शहर में खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर पार्किंग बनायी जाये, ताकि सड़कों पर वाहनों की पार्किंग नहीं हो. महिलाओं के लिए 20 सिटी बसें चलवाएं. महिलाओं से भाड़ा नहीं लिया जाये. सरकार को इससे कुछ घाटा तो होगा, पर इसके दूरगामी लाभ होंगे.
सिटी बसें शहर के सभी प्रमुख मार्गों पर चलायी जायें. एक बार सही तरीके से परिचालन होने के बाद लोग खुद-ब-खुद इन बसों की सवारी करेंगे.
सिटी बसों का किराया ऑटो व ई-रिक्शा के तुलना में कम रखा जाये, ताकि आमलोग इसमें सफर करने के लिए प्रेरित हों. इससे सड़कों पर निजी वाहनों की संख्या में कमी आयेगी.
सड़कों पर जगह-जगह सिटी बसों का पड़ाव निर्धारित हो. हर हाल में ये पड़ाव पर ही सवारियों को उतना और चढ़ना सुनिश्चित किया जाये. इससे लोगों में ट्रैफिक सेंस डेवलप होगा.
राजेश कुमार दास, यातायात और रोड सेफ्टी एक्सपर्ट
ई-रिक्शा के रूट का निर्धारण हो नये सिरे से
रांची नगर निगम ने वर्तमान में ई-रिक्शा के लिए 27 रूटों का रूट पास जारी किया है. लेकिन, इसमें एक बार फिर से नये रूटों को जाेड़ने की जरूरत महसूस हो रही है. शहर के कई बाइलेन सड़कों पर अब भी पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम का अभाव है. ऐसे में इन बाइलेन को नये रूट में शामिल किया जाना चाहिए.
लोगों को नहीं भा रहा चालान काटने का नया नियम
एक सितंबर से मोटरयान (संशोधन) बिल लागू होने का खौफ लोगों पर साफ दिख रहा है. लोग इसके डर से अपने वाहनों के इश्योरेंस, प्रदूषण सर्टिफिकेट समेत अन्य कागजात दुरुस्त करा रहे हैं. साथ ही लाइसेंस के लिए भी आवेदन दे रहे हैं. वहीं अभिभावक अपने नाबालिग बच्चों को वाहन चलाने के लिए नहीं दे रहे हैं. यह सब कुछ ज्यादा जुर्माना भरने के डर से हो रहा है. लेकिन, लोग खुलकर इस नियम का विरोध भी कर रहे हैं. प्रभात खबर की टीम ने इन नये चालान नियम के बारे में राजधानी के लोगों से बातचीत की.
जहां लगायें जुर्माना, वहीं दिये जायेंगे दस्तावेज
ट्रैफिक नियम के उल्लंघन को लेकर लोगों में अलग-अलग तरह की प्रतिक्रिया देखी जा रही है. गुरुवार को खेलगांव चौक के समीप फर्स्ट स्टेप प्ले स्कूल की निदेशक मुकेश कुमार सिंह व प्रिंसिपल श्रीमती शशि सिंह गुजर रही थीं.
जुर्माना की राशि पर पूछे गये सवाल पर उन्होंने कहा कि नये मोटर व्हीकल एक्ट का वे लोग समर्थन करते हैं. लेकिन इस शर्त के साथ कि जिस तरह से ट्रेन में सफर के दौरान टिकट नहीं हाेने की स्थिति में दंड शुल्क के साथ टिकट बनाकर यात्रियों को दे दिया जाता है, उसी तरह वाहन से जुड़ा अन्य दस्तावेज भी दंड शुल्क वसूली के समय ही दे दिया जायें.
फाइन जरूरत से ज्यादा ऐसे सिस्टम नहीं बदलेगा
सिंह मोड़ निवासी चंदन श्रीवास्तव एजी मोड़ से अपनी स्कूटी से गुजर रहे थे. नये ट्रैफिक प्रावधान को लेकर वे कहते हैं : मैं इन दिनों कोलकाता में रहता हूं. वहां इस इतना फाइन नहीं हैं. भीड़ यहां से ज्यादा है, लेकिन ट्रैफिक यहां से ज्यादा स्मूथ है.
सजा का प्रावधान होना चाहिए, लेकिन फाइन जरूरत से ज्यादा है. 10-15 हजार की पुरानी गाड़ी के लिए 10 हजार फाइन भरना पड़े, कहां का न्याय है? कानून व्यावहारिक होना चाहिए. केवल फाइन से सिस्टम नहीं सुधरेगा. सुविधा देनी होगी, ट्रैफिक की नयी तकनीकों का इस्तेमाल भी करना होगा. साथ ही लोगों को माइंड सेट भी चेंज करना होगा.
ये तो पब्लिक की जेब खाली करने की स्कीम है
हरमू रोड निवासी राजेश अग्रवाल कहते हैं : चालान के नाम पर भारी-भरकम राशि वसूलने से जनता परेशान है. सड़क जर्जर हैं, बड़े-बड़े गड्ढे हैं, फुटपाथ है नहीं, हर दिन जाम लगता है. क्या इन सब के लिए सरकार पर फाइन नहीं बनता है. देश की आर्थिक व्यवस्था चौपट हो गयी है.
सरकारें अपना खर्च कम नहीं कर रही है और लोगों पर नये टैक्स लगा देती है. सारा बोझ जनता पर ही क्यों? लाइसेंस बनवाने के लिए महीनों डीटीओ कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं. दलाल काबिज हैं. बेहतर होगा सरकार अपनी व्यवस्था दुरुस्त करें. यदि लोगों का चैन छीन गया, तो जनता भी सरकारों को बेचैन कर देगी.
हमें परेशान कर अपनी जेब भर रही सरकार
विवेकानंद बरियातू रोड में अपनी बाइक का पॉल्यूशन सर्टिफिकेट बनाने गये थे, लेकिन उन्हें खाली हाथ लौटना पड़ा. दरअसल, काउंटर पर इतनी भीड़ थी कि उनकी बाइक का पोल्यूशन सर्टिफिकेट नहीं बन पाया. मौके पर उन्होंने अपनी पीड़ा बतायी. कहा : एक तो सरकार कोई सुविधा नहीं देती, बिना दुरुस्त नहीं करती है और ऊपर से कड़े नियम लागू कर देती है.
लोग ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए दौड़ते रह जाते हैं. सरकार को पहले व्यवस्था दुरुस्त करे, उसके बाद नियम लागू करे. ट्रैफिक रूल्स टूटने पर हजारों वसूली बिल्कुल गलत है. जनता को परेशान कर सरकार अपनी जेब भर रही है.
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