रांची : हरमू मैदान में सरना धर्म सम्मेलन, जुटे सैकड़ों लोग

रांची : सरना धर्मगुरु जयपाल उरांव ने कहा कि आदिवासी आध्यात्मिकता प्रकृति और अनुभव पर आधारित है, काल्पनिक कथा-कहानियाें पर नही़ पूरे विश्व में प्रकृति की एक व्यवस्था है, जिसे अागे बढ़ाने में भूमिका निभाने के लिए हमें भावी पीढ़ी को भी तैयार करना है़ दुनिया को जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण की रक्षा का […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | January 13, 2020 9:26 AM
रांची : सरना धर्मगुरु जयपाल उरांव ने कहा कि आदिवासी आध्यात्मिकता प्रकृति और अनुभव पर आधारित है, काल्पनिक कथा-कहानियाें पर नही़ पूरे विश्व में प्रकृति की एक व्यवस्था है, जिसे अागे बढ़ाने में भूमिका निभाने के लिए हमें भावी पीढ़ी को भी तैयार करना है़ दुनिया को जल, जंगल, जमीन और पर्यावरण की रक्षा का संदेश देना है़
वे राजी पड़हा प्रार्थना सभा रांची जिला समिति और रांची महानगर महिला प्रकोष्ठ द्वारा हरमूमैदान में आयोजित सरना धर्म सम्मेलन सह प्रार्थना सभा को संबोधित कर रहे थे़ कार्यक्रम में छत्तीसगढ़, हजारीबाग, रांची, रामगढ़, चतरा, लोहरदगा, गुमला व लातेहार के धर्मअगुवा भाई- बहन ने भजन प्रस्तुत किये और अपनी बात रखी़ इसमें प्रदेश धर्मगुरु राजेश लिंडा, एतवा उरांव, मेरी उरांव, चंद्रदेव बलमुचू, सुलोचना खलखो, अजीत उरांव, बिगु उरांव, छेदी उरांव, गैना कच्छप सहित कई लोग मौजूद थे.
घर में अपनी भाषा में बात करें, जमीन न बेचें : राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा के राष्ट्रीय सचिव डॉ प्रवीण उरांव ने कहा कि हमें अपनी आदिवासी परंपराओं को बचाना जरूरी है़ बच्चे-युवाओं के लिए शिक्षित होना महत्वपूर्ण है़ अपने गांव का सरना स्थल साफ- सुथरा रखें और हर वृहस्पतिवार को वहां सरना की पूजा करे़ं घरों में बच्चों से अपनी मातृभाषा में ही बात करे़ं अपनी जमीन न बेचे़ं सीएनटी और एसपीटी एक्ट जैसे कानूनों की जानकारी रखेंगे, तभी अपनी जमीन भी बचा सकेंगे़ युवाओं को अपनी क्षमतानुसार व्यवसाय से जुड़ने की जरूरत है़
‘वनवासी नहीं, आदिवासी हम..’
राष्ट्रीय सलाहकार जलेश्वर उरांव ने कविता ‘हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगा के निर्माता हम, वनवासी नहीं आदिवासी हम..’ का पाठ किया़ उन्होंने कहा कि आदिवासियों की आस्था प्रकृति पर आधारित है़ शोधार्थी राधिका बोर्डे ने कहा कि आदिवासी अपने सांस्कृतिक-धार्मिक तरीके से प्रकृति, पर्यावरण की रक्षा का महत्पूर्ण काम कर रहे है़ं वे जो कर रहे हैं, इससे बढ़ कर कुछ भी नहीं हो सकता़ अपने पूर्वजों के ज्ञान से जंगल, नदी, जंगल के संरक्षण-संवर्द्धन को बढ़ावा दे़ं