मामला सांसद रिश्वत कांड का, शिबू सोरेन के खिलाफ संज्ञान लेने से दिल्ली सीबीआइ कोर्ट ने किया इनकार

रांची : दिल्ली स्थित सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश की अदालत ने घूस की रकम को पार्टी का चंदा बताने के मामले में शिबू सोरेन के खिलाफ संज्ञान लेने से इनकार कर दिया है. यह मामला सांसद रिश्वत कांड से जुड़ा था. वर्ष 1993 में हुए सांसद रिश्वत कांड में सीबीआइ ने शिबू सोरन, साइमन मरांडी […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
रांची : दिल्ली स्थित सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश की अदालत ने घूस की रकम को पार्टी का चंदा बताने के मामले में शिबू सोरेन के खिलाफ संज्ञान लेने से इनकार कर दिया है. यह मामला सांसद रिश्वत कांड से जुड़ा था.
वर्ष 1993 में हुए सांसद रिश्वत कांड में सीबीआइ ने शिबू सोरन, साइमन मरांडी और सूरज मंडल के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था. इसमें यह आरोप लगाया गया था कि इन सांसदों ने रिश्वत लेकर नरसिम्हा राव सरकार के पक्ष में मतदान किया था.
रिश्वत कांड में दायर अपील की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में यह फैसला दिया था कि न्यायालय को संसद के अंदर की गतिविधियों पर विचार करने का अधिकार नहीं है. सरकार के पक्ष में वोटिंग का मामला संसद के अंदर का है, इसलिए न्यायालय इस पर विचार नहीं कर सकता. घूस के मामले में अभियुक्तों के खिलाफ न्यायिक कार्रवाई चल सकती है.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के आलोक में दिल्ली स्थित सीबीआइ कोर्ट ने कहा कि इन सांसदों ने पार्टी को चंदा के रूप में दो करोड़ रुपये मिलने से संबंधित दस्तावेज तैयार कर न्यायालय को गुमराह किया है.
यह गंभीर अपराध है. इसलिए फर्जी दस्तावेज बनाने के मामले में सीबीआइ आरोप पत्र दायर करे. 1999 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिये गये आदेश के आलोक में सीबीआइ ने 2007 में शिबू सोरेन के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया. इसमें यह आरोप लगाया गया कि रिश्वत की रकम को पार्टी फंड से लिया गया कर्ज बताया गया. साथ ही रसीद छपवा कर पिछली तिथि से पार्टी को मिले चंदा के रूप में में दिखाया गया.
सीबीआइ द्वारा दायर इस आरोप पत्र पर संज्ञान लेने या नहीं लेने के मुद्दे पर लंबी बहस हुई. दिल्ली स्थित सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश तजेंदर पाल सिंह भल्ला की अदालत ने इस मामले में शिबू सोरेन के खिलाफ संज्ञान लेने से इनकार कर दिया. सुनवाई के दौरान शिबू सोरेन के अधिवक्ता संजीव कुमार की ओर से यह तर्क पेश किया गया कि अदालत ने शीघ्र आरोप पत्र दायर करने का निर्देश दिया था.
लेकिन सीबीआइ ने आठ साल बाद आरोप पत्र दायर किया. दूसरी बात यह कि रसीद छपवाने और रुपये को पार्टी फंड के रूप में दिखाने का मामला रांची से संबंधित है. इस मामले का घटनास्थल रांची है. इसलिए दिल्ली के कोर्ट को इस मामले में संज्ञान लेने का अधिकार नहीं है. अधिवक्ता संजीव कुमार ने कहा है कि न्यायालय के इस फैसले के बाद शिबू सोरेन के खिलाफ किसी भी न्यायालय में किसी तरह का मामला लंबित नहीं रहा.
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