राष्ट्रपति नार्वे और फिनलैंड की यात्रा पर रवाना

भारत में निवेश को करेंगे आकर्षित त्र शिक्षा, व्यापार और पृथ्वी विज्ञान समेत अन्य अनेक क्षेत्रों में सहयोग पर होंगे करारत्र राष्ट्रपति 14 अक्तूबर को फिनलैंड पहुंचेंगे. इनके सम्मान में हेलसिंकी के मेयर दोपहर के भोजन का आयोजन करेंगेत्र कारोबारी प्रतिनिधिमंडलओं और भारतीय समुदाय के लोगों से मिलेंगे. फिनलैंड की संसद का दौरा करेंगेएजेंसियां, नयी […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |

भारत में निवेश को करेंगे आकर्षित त्र शिक्षा, व्यापार और पृथ्वी विज्ञान समेत अन्य अनेक क्षेत्रों में सहयोग पर होंगे करारत्र राष्ट्रपति 14 अक्तूबर को फिनलैंड पहुंचेंगे. इनके सम्मान में हेलसिंकी के मेयर दोपहर के भोजन का आयोजन करेंगेत्र कारोबारी प्रतिनिधिमंडलओं और भारतीय समुदाय के लोगों से मिलेंगे. फिनलैंड की संसद का दौरा करेंगेएजेंसियां, नयी दिल्ली स्कैंडिनेवियाई देशों के साथ भारत के रिश्तों को मजबूती देने के उद्देश्य से राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी रविवार को नार्वे और फिनलैंड की यात्रा पर रवाना हो गये. इस दौरान नार्वे से भारत में बुनियादी संरचना और अन्य क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने की प्रणाली पर काम किया जायेगा. यह किसी राष्ट्रपति की पहली नार्वे यात्रा है. मुखर्जी के साथ केंद्रीय भारी उद्योग और सार्वजनिक उपक्रम राज्यमंत्री पॉन राधाकृष्णन भी यात्रा पर रवाना हुए हैं. दोनों देशों की यात्रा के दौरान वह आर्कटिक सर्किल पार करेंगे और सांता क्लॉज के गांव भी जायेंगे. इसके बाद राष्ट्रपति 17 अक्तूबर को भारत वापस आयेंगे. राष्ट्रपति ने रवाना होने से पहले कारोबारियों और उद्योगपतियों के साथ बैठक कर यह समझा कि भारत को नार्वे से किस तरह से फायदा हो सकता है. उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी, दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग और तीनों सेनाओं के प्रमुखों ने राष्ट्रपति भवन में एक समारोह में मुखर्जी को विदाई दी. नार्वे पेंशन फंड बढ़ाने का विचारफिलहाल नार्वे के 850 अरब डॉलर के पेंशन फंड में से महज चार अरब डॉलर भारत में आते हैं. इसे 20 से 40 अरब डॉलर तक बढ़ाने का विचार है. नार्वे पेंशन फंड को पहले ‘ऑइल फंड’ के नाम से जाना जाता था. इस कोष की शुरुआत 1990 में धन के दीर्घकालिक और मजबूत प्रबंधन के मकसद से की गयी थी. यह नार्वे की पेट्रोलियम संपदा से मौजूदा और भविष्य दोनों पीढि़यों को लाभ पहुंचाने में भी मददगार है. नार्वे दुनिया में हाइड्रोकार्बन का तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है और यहां तेल तथा गैस के बड़े भंडार हैं. भारत के लिए नार्वे महत्वपूर्ण उत्तरी धु्रव और नार्वे के मध्य में भारत का केंद्र ‘हिमाद्रि’ है. पृथ्वी विज्ञान में अत्यंत रुचि इस तथ्य की वजह से है कि आर्कटिक में जो कुछ भी होता है वह जलवायु परिवर्तन के मामले में, मॉनसून के पूर्वानुमान के मामले में और वहां होनेवाले अनेक प्राकृतिक घटनाक्रमों के मामले में हम पर तत्काल प्रभाव छोड़ता है. भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर नार्वे को महत्वपूर्ण देश मानता है. नार्वे यूरोपीय संघ का सदस्य नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में यह बहुत सक्रिय है. नार्वे ने सुरक्षा परिषद के स्थाई और अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ाने का तथा स्थाई सदस्य के रूप में भारत की उम्मीदवारी का समर्थन किया है.

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