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अपराधियों को सजा दिलाने में झारखंड पीछे

आरके मल्लिक 05: अभियोजन कोषांग एवं फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी सुदृढ़ किये बिना पुलिस सुधार का फल जनता को नहीं मिलेगा. पुलिस द्वारा किये गये सारे प्रयास तब असफल हो जाते हैं जब अपराधियों को सजा नहीं मिलती. एनसीआरबी की 2012 की रिपोर्ट के आंकड़े के अनुसार अपराधियों को सजा दिलाने का राष्ट्रीय औसत 38.5 प्रतिशत […]

By Prabhat Khabar Digital Desk | January 5, 2015 9:32 AM
आरके मल्लिक
05: अभियोजन कोषांग एवं फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी सुदृढ़ किये बिना पुलिस सुधार का फल जनता को नहीं मिलेगा. पुलिस द्वारा किये गये सारे प्रयास तब असफल हो जाते हैं जब अपराधियों को सजा नहीं मिलती.
एनसीआरबी की 2012 की रिपोर्ट के आंकड़े के अनुसार अपराधियों को सजा दिलाने का राष्ट्रीय औसत 38.5 प्रतिशत है, जबकि झारखंड में यह आंकड़ा सिर्फ 23.2 प्रतिशत है.
हमें इस आंकड़े को पीछे छोड़ना होगा, क्योंकि कानून में डर का अर्थ डंडा का भय नहीं होना चाहिए, बल्कि इस बात का भय होना चाहिए कि नियम तोड़ने पर कानून सजा देगा. किसी भी समाज में जब व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुलिस बर्बरता का इस्तेमाल करती है, तो वह समाज सभ्य होने का दावा नहीं कर सकता है. बहुत से राज्यों के प्रमुख शहरों में ‘सीसीटीवी सर्वेलांस सिस्टम’ लागू किया जा रहा है. इससे न सिर्फ एक सुरक्षित वातावरण तैयार हो रहा है, बल्कि नियम कानून को लागू करने में भी मदद मिल रही है. उदाहरण के लिए सबसे अच्छा प्रभाव ट्रैफिक का नियम मानने पर पड़ रहा है. यह सत्य ही कहा गया है कि जो नागरिक ट्रैफिक के नियमों का पालन करता है, वह व्यक्ति गंभीर अपराध करेगा, इसकी काफी कम संभावना है.
उपरोक्त उदाहरण कुछ कदम हैं जिनके द्वारा तात्कालिक तौर पर पुलिस व्यवस्था में सुधार लाया जा सकता है. और भी कई दूरगामी उपाय हो सकते हैं लेकिन यह निश्चित है कि सामान्य नागरिकों के जीवन में बेहतर परिवर्तन लाने का इससे उपयुक्त समय और कोई नहीं हो सकता. (समाप्त)
(लेखक एसटीएफ के आइजी हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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