इस वर्ष 7.64 करोड़ लीटर दुग्ध उत्पादन का अनुमान: एलआर सिंह

दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर है राज्य रांची : भारत एग्रो इंडस्ट्री फाउंडेशन (बाएफ) के मुख्य कार्यक्रम समन्वयक एलआर सिंह ने मीडिया को बताया कि झारखंड जल्द ही दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर हो जायेगा. भारत सरकार द्वारा जारी पशु गणना 2012 के अनुसार राज्य में वर्ष 2007 की तुलना में 65 प्रतिशत गायों की संख्या में […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर है राज्य
रांची : भारत एग्रो इंडस्ट्री फाउंडेशन (बाएफ) के मुख्य कार्यक्रम समन्वयक एलआर सिंह ने मीडिया को बताया कि झारखंड जल्द ही दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भर हो जायेगा. भारत सरकार द्वारा जारी पशु गणना 2012 के अनुसार राज्य में वर्ष 2007 की तुलना में 65 प्रतिशत गायों की संख्या में वृद्धि हुई है.
प्रति गाय दुग्ध उत्पादन में भी 14.23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. बाएफ ने वर्ष 2005 में गव्य विकास निदेशालय, झारखंड में कार्य प्रारंभ किया.
राज्य के किसानों की स्थिति सुधरी है. वर्तमान में राज्य के 24 जिलों में 1010 केंद्रों के माध्यम से पशु नस्ल सुधार कार्यक्रम चलाया जा रहा है. कार्यक्रम के तहत 21387 गांवों के 9,14,998 किसान लाभांवित हुए हैं.
2.8 लाख उन्नत नस्ल की बछिया का जन्म हुआ है. वर्ष 2015-16 में दुग्ध उत्पादन 7.64 करोड़ लीटर होने का अनुमान है. इसका अनुमानित मूल्य 111.50 करोड़ रुपये है. झारखंड में ज्यादातर संख्या अवर्णित जानवरों की है जो औसतन प्रतिदिन 1.59 लीटर दूध देती हैं. राज्य सरकार की परियोजना के कारण लोगों की दुग्ध व्यवसाय में रुचि बढ़ी है.
हरे चारे से आयी जीवन में हरियाली
समन्वयक एलआर सिंह ने कहा कि रांची जिले के बुढ़मू प्रखंड के बेरवारी गांव के पशुपालक लाल कुंदन नाथ शाहदेव और प्रभाकर शाह ने मिल कर गो पालन का काम 2013 में शुरू किया.
एक वर्ष के अंदर ही डेयरी की 12 गायों के मर जाने से दोनों का मनोबल टूट गया. इन दोनों ने हरे चारे की व्यावसायिक खेती की योजना बनायी. बाएफ के सहयोग से थोड़ी कामयाबी मिली तो पर्सनल लोन लेकर व्यावसायिक डेयरी की स्थापना की. अब उनकी डेयरी में गायों की संख्या 90 है.
इससे प्रतिदिन लगभग 750 लीटर दूध उत्पादन हो रहा है. श्री सिंह ने बताया कि पूर्व में दूध उत्पादन में लागत ज्यादा और लाभ कम था. सभी गायों के रख-रखाव पर प्रतिमाह 30 हजार रुपये से ज्यादा का खर्च था. बाएफ के अधिकारियों के सहयोग से हरे चारे की खेती की. अब उनकी जिंदगी रास्ते पर आ गयी है.
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