रतन कुमार महतो
विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 2011 से 2015 तक के सभी साल अब तक के सबसे गरम वर्ष रहे. इसका कारण वैश्विक परिवर्तन है. अलनीनो के प्रभाव के कारण 2015 के दौरान हमारा दक्षिण मॉनसून कमजोर रहा है. इस कारण झारखंड में कम वर्षा हुई.
वैश्विक के साथ-साथ स्थानीय कारण भी है. तेजी से जंगलों की कटाई हो रही है. कंक्रीट के जंगल बनते जा रहे हैं. प्रदूषण बढ़ रहा है. इस कारण बिहार की ग्रीष्मकालीन राजधानी कही जानेवाली रांची का मौसम अब नाम के अनुकूल नहीं रहा. आकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि गरम दिनों की संख्या बढ़ रही है. बारिश कम हो रही है. ठंड का अंतराल कम होता जा रहा है. अमेरिकी अंतरिक्ष एेजेंसी नासा की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बार का फरवरी माह सबसे गरम रहा. फरवरी में करीब-करीब हर दिन तापमान सामान्य से अधिक रहा.
रांची, जमशेदपुर, डालटेनगंज में अधिकतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला गया. रांची में अधिकतम तापमान 34.2, जमशेदपुर में 38.2 तथा डालटेनगंज में 37 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड किया गया. यह चिंताजनक स्थिति है. इन जिलों में तापमान सामान्य से छह, सात, आठ व नौ डिग्री तक ऊपर रहा. मौसम विज्ञान विभाग 19 फीसदी कम या अधिक बारिश को सामान्य के करीब मानता है, जबकि पिछले साल जून से सितंबर तक आठ जिलों में तापमान सामान्य से 25 से 40 डिग्री सेल्सियस तक कम रहा. जून-जुलाई में बारिश ठीक रही. अगस्त और सितंबर में बारिश निराशाजनक हुई. एयरपोर्ट स्थित संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ जीके मोहंती ने 1969 से 2010 तक के डाटा का विश्लेषण किया था.
इसमें पाया गया था कि गरम काल की अवधि बढ़ती गयी है. इससे बचने के लिए पेड़ लगाने, कंक्रीट के जंगल को कम करने व नदियों स्वच्छ रखने की जरूरत है. ग्रीन झारखंड बनाते हुए ग्रीन धरती कार्यक्रम को सफल बनाने की जरूरत है.
लेखक मौसम विज्ञान विभाग के वरीय वैज्ञानिक हैं