इको जांच में नहीं मिलेगी वेटिंग

रिम्स. हृदय रोगियों के लिए खुशखबरी रांची : रिम्स में हृदय रोगियों को चिकित्सीय परामर्श के बाद अब जांच में वेटिंग नहीं मिलेगी. चिकित्सीय परामर्श के साथ ही मरीजों की इको जांच की जायेगी. रिम्स प्रबंधन व कार्डियाेलॉजी विभाग नये साल से जांच में वेटिंग सिस्टम को समाप्त करने जा रहा है. प्रबंधन का मानना […]

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रिम्स. हृदय रोगियों के लिए खुशखबरी

रांची : रिम्स में हृदय रोगियों को चिकित्सीय परामर्श के बाद अब जांच में वेटिंग नहीं मिलेगी. चिकित्सीय परामर्श के साथ ही मरीजों की इको जांच की जायेगी. रिम्स प्रबंधन व कार्डियाेलॉजी विभाग नये साल से जांच में वेटिंग सिस्टम को समाप्त करने जा रहा है. प्रबंधन का मानना है कि हृदय रोगियों के लिए एक मिनट भी अहम होता है. एेसे में अगर मरीजों की जांच समय पर नहीं हुई, तो उनकी जान तक जा सकती है. कार्डियोलॉजी विभाग ने रिम्स प्रबंधन को सुझाव दिया है कि जांच समय पर हो, इसके लिए पंजीयन व कैश काउंटर का संचालन सुपर स्पेशियालिटी विंग में किया जाये. गौरतलब है कि रिम्स के कार्डियोलॉजी विभाग में मरीजों को जांच के लिए एक-एक माह की वेटिंग दी जाती थी.

19 दिसंबर के बाद वेटिंग न दें : रिम्स के कार्डियोलॉजी विभाग के इंचार्ज डाॅ प्रकाश कुमार ने जूनियर डॉक्टरों एवं नर्सों को निर्देश दिया है कि 19 दिसंबर के बाद मरीजों को जांच में वेटिंग नहीं दी जाये. जिन मरीजों को वेटिंग दिया गया है, उनकी जांच 19 दिसंबर तक पूरी कर ली जाये.

रांची : राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में साइटो जेनेटिक मरीजों का अलग पंजीयन होगा. पंजीयन काउंटर पर परची बनाते समय मरीज को बताना होगा कि जेनेटिक विभाग में परामर्श लेना है. पंजीयन परची बनाने के बाद मरीज को जेनेटिक ओपीडी में परामर्श मिल जायेगा. अलग पंजीयन कराने का उद्देश्य जेनेटिक मरीजों का डाटा तैयार करना भी है. वर्तमान में जेनेटिक बीमारी से पीड़ित बच्चों को शिशु विभाग में पंजीयन कराना पड़ता है. इससे जेनेटिक बीमारी से पीड़ित कितने मरीजों का इलाज हुआ, इसका आंकड़ा नहीं रहता है.

जेनेटिक ओपीडी के लिए बनायी गयी टीम : रिम्स में जेनेटिक ओपीडी संचालित करने के लिए अलग टीम बनायी गयी है. इसकी जिम्मेदारी शिशु चिकित्सक डॉक्टर अमर वर्मा को दिया गया है. पैथोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ त्रिलोचन सिंह भी इसमें सहयोग करेंगे. दो युवा शिशु चिकित्सकों को भी इससे जोड़ा गया है.

क्या है साइटो जेनेटिक : साइटो जेनिटिक में क्रोमोजोम का विश्लेषण किया जाता है. क्रोमोजोम के माध्यम से बीमारी के सही कारणों का पता लगाया जाता है. इससे शरीर के संरचना एवं विकास में आनेवाली बाधा को खोजा जाता है. इसके बाद मरीज का इलाज किया जाता है, जिससे सटीक नतीजे मिलते हैं.

जेनेटिक विंग का अलग से पंजीयन करने की प्रक्रिया शीघ्र शुरू कर दी जायेगी. इससे जेनेटिक मरीजों की संख्या का सही आंकड़ा तैयार करने में भी मदद मिलेगी. टीम बना दी गयी है. उपकरण भी मंगा लिया गया है.

डॉ बीएल शेरवाल, निदेशक, रिम्स

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