झारखंड में बेहाल हैं आयुष के मेडिकल कॉलेज, पांच में चार बंद, अंतिम की मान्यता खतरे में

रांची: वित्तीय वर्ष 2001-02 में तय राज्य के आयुष के तीन मेडिकल कॉलेज और दो आयुर्वेदिक फार्मेसी कॉलेजों की हालत ठीक नहीं है. 15 साल बाद भी दो का भवन नहीं बन पाया है. तीसरे का भवन बना, पर पढ़ाई नहीं शुरू हुई. चौथे में पढ़ाई शुरू हुई, पर अर्हता का पालन नहीं करने के […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
रांची: वित्तीय वर्ष 2001-02 में तय राज्य के आयुष के तीन मेडिकल कॉलेज और दो आयुर्वेदिक फार्मेसी कॉलेजों की हालत ठीक नहीं है. 15 साल बाद भी दो का भवन नहीं बन पाया है. तीसरे का भवन बना, पर पढ़ाई नहीं शुरू हुई. चौथे में पढ़ाई शुरू हुई, पर अर्हता का पालन नहीं करने के कारण मान्यता रद्द हो गयी. अंतिम पांचवें कॉलेज गोड्डा के पारसपानी स्थित स्टेट होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में अर्हता के पालन के लिए दिये गये 31 दिसंबर की समय सीमा बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हो पाया है. अब सेंट्रल काउंसिल अॉफ होम्योपैथ के रहमोकरम पर है कॉलेज की मान्यता. जनवरी में काउंसिल की टीम का दौरा है.
इससे पूर्व विभाग ने इस इकलौते कॉलेज की मान्यता बचाने की कवायद शुरू कर दी है. सनद रहे कि सत्र 2016-17 के लिए काउंसिल ने कॉलेज को सशर्त मान्यता दी थी. शर्त के अनुसार कॉलेज के स्वीकृत 157 पद को भरना था, पर अभी भी कॉलेज कुल 10 कर्मियों के भरोसे चल रहा है. इसमें प्राचार्य से लेकर शिक्षक, लिपिक व अन्य पद शामिल हैं. सूचना के अनुसार विभाग फिलहाल संविदा के आधार पर 68 नयी बहाली यहां करने की तैयारी में है. बाद में पूरे सीट के लिए बहाली की प्रक्रिया की जायेगी. विभाग इसी नयी बहाली के आधार पर काउंसिल से मान्यता बनाये रखने की अपील करेगा. जानकारों अनुसार आयुष के प्रति उपेक्षा कारण ही राज्य में यह स्थिति है. कर्मचारी से लेकर चिकित्सक, दवा और अन्य साधनों की हालत खराब है. कॉलेजों के भी बदहाल होने के कारण राज्य में आयुष चिकित्सकों की जबरदस्त कमी है. आज भी झारखंड दूसरे राज्यों से पढ़े चिकित्सकों के भरोसे है. हाल के दिनों में आयुष के प्रति विभाग व सरकार के बढ़ते रुझान से भविष्य सुधरने की आस बंधी है.
एक नजर झारखंड के कॉलेजों पर
चाईबासा के जगन्नाथपुर में शुरू होनेवाले स्टेट आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का भवन नहीं बन पाया है. गिरिडीह में शुरू होनेवाले स्टेट यूनानी मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल का भवन तो बन गया, पर यहां पढ़ाई नहीं शुरू हो पायी है. जानकारों के अनुसार कर्मियों की कमी कारण है. गुमला में शुरू होनेवाले स्टेट आयुर्वेदिक फार्मेसी कॉलेज का भवन अब तक नहीं बन पाया है. दूसरी ओर साहेबगंज स्थित स्टेट आयुर्वेदिक फार्मेसी कॉलेज शिक्षकों की कमी के कारण बंद हो गया है. यहां कॉलेज का भवन तो नहीं बना, पर होस्टल में पढ़ाई शुरू हुई थी. 30 सीट वाले इस कॉलेज से मात्र एक सत्र (2006-07) में नामांकन हुआ. एक बैच पढ़ाई कर निकला, उसके बाद संसाधन की कमी के कारण काउंसिल ने इसकी मान्यता रद्द कर दी. फिर यहां पढ़ाई बंद हो गयी. वर्तमान में सिर्फ एक कर्मचारी हैं प्राचार्य डॉ सुनील कुमार झा. दूसरी ओर गोड्डा के पारसपानी स्थित स्टेट होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल की हालत भी ठीक नहीं.

यहां के प्राचार्य डॉ ज्योतिश्वर सिंह आयुष के रजिस्ट्रार के रूप में भी कार्यरत हैं. यहां चार चिकित्सक शिक्षक के रूप में पदस्थापित हैं, इनके अलावा प्राचार्य को लेकर छह अन्य कर्मी हैं. पर 50 सीट वाले इस कॉलेज की स्थिति बहुत अच्छी नहीं. यहां न तय शिक्षक हैं और न ही अन्य कर्मचारी. सेंट्रल काउंसिल अॉफ होम्योपैथी ने सारी कमियों को पूरा करने के लिए 31 दिसंबर तक का समय दिया है. अब यहां भी संकट के बादल मंडरा रहे.

क्या हो रही दिक्कत
राज्य में अभी सिर्फ गढ़वा में एक प्राइवेट होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज चल रहा है. इसके अलावा राज्य में कहीं भी कोई यूनानी या आयुर्वेदिक कॉलेज नहीं है. इस कारण राज्य में आयुष चिकित्सकों की कमी है. प्राइवेट प्रैक्टिस करनेवाले आयुष चिकित्सक भी राज्य में कम हैं. इस कारण राज्य में इस पद्धति की चिकित्सा प्रणाली घट रही है. दूसरे जो यहां से पढ़े भी हैं, उनके सामने भी संकट है, क्योंकि एक कॉलेज की मान्यता समाप्त हो गयी, दूसरे पर संकट है. अब यहां से पास छात्र भी कहीं कुछ कह नहीं पाते.
यह है राहत
अभी राज्य सरकार व विभाग भी आयुष के प्रति जागरूक हुआ है. चिकित्सकों की बहाली के साथ कॉलेज अस्पतालों को भी खोलने पर विभागीय बैठकों का दौर जारी है. इससे सकारात्मक रिजल्ट की उम्मीद जगी है.
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