कैसे होगा राज्य में फ्लोराइड पर नियंत्रण?

रांची: राज्य में फ्लोराइड और उससे होनेवाली बीमारी फ्लोरोसिस की रोकथाम के लिए मिलनेवाले केंद्रीय मदद का उपयोग सही तरीके से नहीं हो पा रहा. इस कारण न सिर्फ केंद्रीय मदद में कटौती हो रही है, बल्कि चालू वित्त वर्ष में नौ नये जिले के लिए मदद के वास्ते भेजे गये प्रस्ताव पर भी संशय […]

By Prabhat Khabar Digital Desk |
रांची: राज्य में फ्लोराइड और उससे होनेवाली बीमारी फ्लोरोसिस की रोकथाम के लिए मिलनेवाले केंद्रीय मदद का उपयोग सही तरीके से नहीं हो पा रहा. इस कारण न सिर्फ केंद्रीय मदद में कटौती हो रही है, बल्कि चालू वित्त वर्ष में नौ नये जिले के लिए मदद के वास्ते भेजे गये प्रस्ताव पर भी संशय उत्पन्न हो गया है.
जानकारी के अनुसार राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीपीसीएफ) के तहत केंद्र ने झारखंड के चार जिलों क्रमश: पलामू, गढ़वा, चतरा और हजारीबाग का चुनाव किया था. इसके लिए केंद्र ने जिलावार राशि भी दी, लेकिन इसका उपयोग राज्य के सभी जिलों ने सही तरीके से नहीं किया. सूत्रों के अनुसार वित्त वर्ष 2015-16 में केंद्रीय मदद के रूप में चारों जिलों को 19-19 लाख रुपये मिले थे. इस पैसे का इस्तेमाल गढ़वा व पलामू में तो किया गया, लेकिन हजारीबाग ने एक भी पैसा खर्च नहीं किया, जबकि चतरा ने आंशिक रूप से इस्तेमाल किया. इस कारण चालू वित्त वर्ष में केंद्र ने बजट में कटौती कर प्रति जिला छह-छह लाख रुपये आवंटित किये हैं, पर इस वित्त वर्ष भी चतरा ने आंशिक और हजारीबाग ने अभी तक पैसे का इस्तेमाल नहीं किया है. जानकारों के अनुसार इस कारण अगले वित्त वर्ष में इस मद में केंद्रीय फंड के और कम हो जाने की आशंका है. सनद रहे चालू वित्त वर्ष में राज्य के अन्य नौ जिलों के लिए इस मद में केंद्रीय मदद के लिए राज्य से प्रस्ताव भेजा गया है, पर चालू फंड के ही इस्तेमाल में कमी होने के कारण नये जिलों के लिए फंड मिलने और पुराने जिलों के लिए ज्यादा फंड मिलने में दिक्कत दिखने लगी है.
जो जिले शामिल होने हैं
इन चार जिलों के अलावा रांची, पाकुड़, साहेबगंज, रामगढ़, जामताड़ा, गोड्डा, सिमडेगा, धनबाद व गिरिडीह को शामिल करने के लिए राज्य सरकार की ओर से केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है.
हजारीबाग में है संकट
हजारीबाग में विभाग राष्ट्रीय फ्लोरोसिस रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम अभियान नहीं चला रहा है, पर यहां के पांच प्रखंडों में इसका संकट बरकरार है. इनमें शामिल हैं केरेडारी, बड़कागांव, विष्णुगढ़, टाटीझरिया व कटकमसांडी. लोगों के अनुसार अगर यह अभियान चलता, तो उन्हें ज्यादा फायदा होता.
अब क्या होना है
एनपीपीसीएफ के तहत चिह्नित जिलों में केंद्र से मिलनेवाले फंड के साथ राज्य पेयजल एवं स्वच्छता विभाग की मदद से अभियान चलाया जाता है. इसके लिए स्वास्थ्य विभाग संबंधित जिले में एक कंसल्टेंट, एक लेबोरेटरी टेक्नीशियन और तीन फिल्ड इंवेस्टीगेटर (ये तीनों छह माह के लिए) की तैनाती करता है. तीन माह बाद फिल्ड इंवेस्टिगेटरों की जगह सहिया की मदद लेनी है. पहले इसके इंचार्ज संबंधित जिला के सिविल सर्जन हुआ करते थे, लेकिन अब जिला कुष्ठ पदाधिकारी इंचार्ज होते हैं. इनके निर्देशन में संबंधित जिले में फ्लोराइड की रोकथाम और उपचार की व्यवस्था होती है. जिलों को प्रति माह खर्च और प्रगति की रिपोर्ट राज्य कार्यालय में स्टेट नोडल पदाधिकारी को भेजनी होती है.
क्या हुआ
पलामू और गढ़वा तो काम हुआ, पर चतरा में इस वर्ष भी आंशिक काम हुआ. हजारीबाग में तो टीम का ही गठन नहीं किया गया है. चतरा में सिर्फ एक लेबोरेटरी टेक्नीशियन के भरोसे अभियान चल रहा है. सूत्रों के अनुसार हर माह नियम से जिलों से रिपोर्ट भी नहीं आती.
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