Sarhul 2023: आदिवासियों का सबसे प्रमुख पर्व है सरहुल. इस पर्व के साथ ही फसलों की कटाई शुरू होती है. सरहुल से ही आदिवासियों का नववर्ष शुरू होता है. चैत्र में मनाये जाने वाला सरहुल दो शब्दों से मिलकर बना है. ‘सर’ और ‘हुल’ के मिलन से सरहुल बना है. ‘सर’ का अर्थ होता है ‘सरई’ यानी सखुआ (साल का पेड़) के ‘फूल/फल’. वहीं, हुल का अर्थ है ‘क्रांति’. दोनों जब मिलता है, तो बनता है सरहुल. इस तरह सखुआ के फूलों की क्रांति को ‘सरहुल’ कहा जाता है.
आदिवासियों का सबसे प्रमुख पर्व झारखंड में बड़े जोश-ओ-खरोश और धूमधाम से मनाया जाता है. झारखंड के साथ-साथ यह पर्व पड़ोसी राज्यों ओडिशा, पश्चिम बंगाल और मध्यप्रदेश में भी मनाया जाता है. सरहुल पर प्रकृति की पूजा की परंपरा के साथ-साथ नृत्य का भी प्रचलन है.
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सरहुल मुख्यत: फूलों का त्योहार है. पतझड़ के बाद पेड़ों की टहनियों पर नये-नये पत्ते एवं फूल खिलते हैं. साल के पेड़ों पर खिलने वाले फूलों का सरहुल में विशेष महत्व होता है. चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को शुरू होने वाला यह प्रकृति पर्व चार दिनों तक यानी चैत्र पूर्णिमा के दिन तक चलता है.
सरहुल का त्योहार अलग-अलग गांवों में अलग-अलग समय पर मनाया जाता है. मुख्य त्योहार इन चार दिनों तक चलता है, लेकिन गांवों में एक महीने तक यह पर्व चलता है. लोग अखड़ा में नाचते-गाते हैं और परंपरा के अनुरूप इस त्योहार पर पूजा-अर्चना भी करते हैं.
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आदिवासियों का सबसे बड़ा पर्व सरहुल 4 दिन तक मनाया जाता है. अलग-अलग दिन अलग-अलग परंपरा है. उसका पालन सभी लोग करते हैं.
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पहला दिन : सरहुल के पहले दिन मछली के अभिषेक किये हुए जल को घर में छिड़का जाता है.
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दूसरा दिन : सरहुल के दूसरे दिन उपवास रखा जाता है. गांव का पुजारी गांव की हर घर की छत पर साल के फूल रखता है.
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तीसरा दिन : सरहुल के तीसरे दिन गांव का पाहन सरना स्थल पर सरई के फूलों की पूजा की जाती है. पहन उपवास रखता है. इसी दिन पाहन के द्वारा मुर्गी की बलि दी जाती है. चावल और बलि की मुर्गी का मांस मिलाकर खिचड़ी बनायी जाती है, जिसे सूड़ी कहते हैं. पूरे गांव में प्रसाद के रूप में इसका वितरण किया जाता है.
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चौथा दिन : पूजा के चौथे दिन गिड़ीवा नामक स्थान पर सरहुल फूल का विसर्जन किया जाता है.