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My Mati: जंगल का प्रबंधन करता बरंगा टोला ग्रामसभा

एक ऐसे समय में जब लोकतंत्र खतरे में नजर आता है, बरंगा जंगल के भीतर उनके ग्रामसभा के माध्यम से लोगों के इस तरह के सामूहिक प्रयास और सामूहिक निर्णयों ने देश में लोकतंत्र के बचे रहने की उम्मीद को सहेज कर रखा है.

My Mati: जंगल के भीतर या उसके आस-पास रहते आदिवासियों को लेकर मुख्यधारा की कुछ ऐसी मानसिकता बनी हुई है कि आदिवासी जंगल को खत्म कर रहे हैं, पर ऐसा नहीं है़. शायद मुख्यधारा के संपर्क में आने के कारण कुछ लोग इस तरह के कामों से जुड़ गये हों, पर मुख्यधारा से कटे इलाकों में, सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासियों और जंगलों के बीच का नैसर्गिक रिश्ता स्पष्ट नजर आता है. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड स्थित बरंगा जंगल के भीतर रहने वाले मुंडाटोला के लोग इसकी एक बानगी हैं.

इस गांव में नहीं थी कोई सड़क

पहले मुंडा आदिवासी बहुल इस गांव में कोई सड़क नहीं थी. किसी के बीमार होने पर लोग उसे खाट में लिटाकर, उसे ढोकर प्रखंड अस्पताल ले जाते थे. गांव के बच्चों की स्कूल ड्रॉपआउट दर काफी थी. लेकिन जब से इस गांव के लोगों को ग्रामसभा की महत्व और इसकी शक्ति से परिचित हो गये हैं, तब से ग्रामसभा के उपयोग कर ये अपने जन-जीवन और जंगल के हित में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं.

यहां के लोगों ने अब ग्रामसभा से जुड़कर अपने अधिकार और अपनी ताकत को समझा. धीरे-धीरे ग्रामसभा सशक्त होने लगी. मुंडाटोला के लोगों ने इसके माध्यम से जंगल को बचाने का काम शुरू किया. इसके साथ ही दूसरे गांव के लोगों को जंगल बचाने के लिए प्रेरित करने का बीड़ा भी उठाया.

मुंडाटोला ग्रामसभा के सचिव जेराय हेंब्रम बताते हैं – “शुरूआत में गांव की बैठकों में लड़ाई झगड़ों से संबंधित समस्याओं का निपटारा होता था. पूजा-पाठ की तैयारी के लिए चंदा जमा करने को लेकर बातचीत होती थी़ तब जंगल की सुरक्षा को लेकर किसी तरह की बात नहीं होती थी. ग्रामसभा को ठीक से समझने के बाद लोग अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों पर भी विचार करने लगे. लोगों ने महसूस किया कि आने वाली नयी पीढ़ी के लिए जंगलों का बचा रहना जरूरी है और इसे बचाने की जिम्मेवारी गांव के लोगों की ही है. इसके बाद गर्मी के दिनों में जंगल में आग लग जाने या महुआ चुनने के लिए पेड़ के नीचे पत्तों को जलाने और हवा से आग के जंगल में फैल जाने पर पूरा गांव उसे बुझाने के लिए जुटने लगा. लोग जंगल में जाकर झाड़ू लगाते हैं और घेरा बनाते हैं, ताकि आग आगे न फैले. कभी कभी रात में आग बुझाने के समय वे रास्ता भी भटक जाते हैं. पर इन मुसीबतों के बावजूद भी वे रात- बिरात कभी भी इस काम के लिए तत्पर रहते हैं.”

ग्रामसभा सदस्य मुक्ता सोय का कहना है – “आग बुझाने के काम में स्त्रियां और बच्चे भी अपनी भूमिका निभाते हैं. ऐसे समय में, जब गांव के पुरुष काम करने के लिए बाहर चले जाते हैं और गांव में सिर्फ स्त्रियां व बच्चे ही रह जाते हैं, तब दिन हो या रात जंगल में कहीं भी आग लगी हो, गांव की सारी स्त्रियां अपने बच्चों के साथ आग बुझाने के लिए निकल पड़ती हैं.”

जंगल में छोड़ देते हैं जानवरों का हिस्सा

मुक्ता इस बारे में और विस्तार से बताते हुए कहती हैं – “ लोग न सिर्फ जंगल की रक्षा ही कर रहे हैं, बल्कि जंगल में फलदार पेड़ लगाने का काम भी कर रहे हैं. जंगली जानवरों के गांव या शहर की ओर जाने का एक मुख्य कारण यह है कि वे भूख से लड़ रहे होते हैं. जंगल के खत्म होने से उनका घर भी उजड़ता है. जंगल में खनन से उनके लिए जलस्रोत भी खत्म हो रहे हैं. इसलिए वे भोजन ढूंढ़ने के लिए लोगों के घरों में जा रहे हैं. इसे रोकने के लिए गांव के लोगों ने जंगल के भीतर फलदार पौधे लगाए हैं ताकि जब ये फलेंगे, तब जानवरों को उनके इलाके में ही खाने की चीजें मिल जायेंगी. लोग हाथियों के लिए केला, बांस आदि लगाते हैं. जंगल में कुछ पेड़ों के फल लोग नहीं लेते, ताकि बंदर और दूसरे जानवर उन्हें खा सकें. वे जंगल में जानवरों का हिस्सा छोड़ देते हैं.”

ग्रामसभा के वनाधिकार समिति के अध्यक्ष शैलेंद्र समद कहते हैं – “गांव के लोगों ने महसूस किया है कि जंगल पर अपना अधिकार कहने भर से नहीं होता, बल्कि यह अधिकार जंगल की सुरक्षा की जिम्मेवारी उठाने से मजबूत होती है. जंगल का प्रबंधन आपसी सहयोग, नेतृत्व व सामूहिक तौर पर निर्णय से करने के लिए ग्रामीणों ने 150 एकड़ जंगल के भूभाग के लिए सामूहिक पट्टा का आवेदन दिया है. वनाधिकार समिति का गठन किया है और इस समिति के माध्यम से उन्होंने जंगल के दूसरे गांव के लोगों से संवाद और संपर्क भी बढ़ाया है़.”

उसी प्रकार सचिव जेराय हेंब्रम जानकारी देते हुए कहता है, “गांव के लोगों ने अपनी पहल से बाजार और दूसरे गांवों तक पहुंचने के लिए सड़क बनायी है़ उसी सड़क को आज सरकार पक्की सड़क में तब्दील कर रही है. सड़क बनने से बच्चों और लोगों को अब स्कूल, हाट बाज़ार जाने में सुविधा हो रही है.”

मुंडाटोला के लोगों ने अपनी संस्कृति को बचाने की मुहिम भी शुरू की है. जेराय आगे कहते हैं – “जंगल से आदिवासियों की संस्कृति जुड़ी हुई है. नयी पीढ़ी को यह सबकुछ हस्तांतरित करने की सोच को लेकर लोगों ने गांव में एक सांस्कृतिक दल का गठन किया है. यह गांव के पर्व त्यौहार में पारंपरिक वाद्य यंत्रों के प्रयोग और गीत-नृत्य को बचाने का काम करता है. बच्चों को प्रशिक्षण देने का काम भी दल के लोग करते हैं. युवाओं को आदिवासियों के जंगल से जुड़े पर्व त्योहारों के पीछे छिपे जीवन दर्शन के बारे भी बताया जाता है.”

एक ऐसे समय में जब लोकतंत्र खतरे में नजर आता है, बरंगा जंगल के भीतर उनके ग्रामसभा के माध्यम से लोगों के इस तरह के सामूहिक प्रयास और सामूहिक निर्णयों ने देश में लोकतंत्र के बचे रहने की उम्मीद को सहेज कर रखा है.

पश्चिमी सिंहभूम के बरंगा जंगल में बसा है मुंडाटोला

रांची के बुंडू तमाड़ के सारजोमडीह और डिबुडीह गांव से बहुत पहले उनके पुरखे जंगल के भीतर चलते हुए पश्चिमी सिंहभूम के बरंगा जंगल पहुंचे. वहां से कुछ लोग ओडिशा की ओर भी आगे बढ़े लेकिन वे लोगों के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाये, बरंगा जंगल लौट आये और वहीं बस गये. इस तरह जंगल में एक नया गांव बस गया. उन्होंने अपने गांव का नाम मुंडाटोला रखा. बरंगा जंगल करीब दस गांवों को छूता है.

रिपोर्ट: जसिंता केरकेट्टा

Prabhat Khabar News Desk
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