sarhul : नेपाल में खद्दी पर्व यानी सरहुल पर होता है उत्साह, बांग्लादेश में सादगी से मनेगा

नेपाल में भी झारखंडी मूल के आदिवासी लंबे समय से रह रहे हैं. इन प्रकृति पूजकों ने नेपाल में भी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को बरकरार रखा है. वहां पर सिर्फ उरांव समुदाय की जनसंख्या एक लाख के करीब है

By Prabhat Khabar News Desk | April 1, 2025 12:53 AM

रांची. नेपाल में भी झारखंडी मूल के आदिवासी लंबे समय से रह रहे हैं. इन प्रकृति पूजकों ने नेपाल में भी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को बरकरार रखा है. वहां पर सिर्फ उरांव समुदाय की जनसंख्या एक लाख के करीब है. इसके अलावा मुंडा, संताल समुदाय के लोग भी वहां निवास कर रहे हैं. नेपाल के मानवशास्त्री और साहित्यकार बेचन उरांव ने कहा कि हमारे यहां सरहुल को खद्दी पर्व के रूप में मनाया जाता है. इसे हम फगु पर्व भी कहते हैं. इस अवसर पर यहां की नयी पीढ़ी को भी इन पर्व के महत्व और इनकी उत्पत्ति की जानकारी कथा के माध्यम से बतायी जाती है. बेचन उरांव ने कहा कि आपके यहां दिन सरहुल पर्व का दिन निर्धारित है पर यहां ऐसा नहीं है. झारखंड में सरहल की शुरूआत के बाद हमलोग नेपाल में भी सरहुल मनायेंगे. पूजा के दिन ईश्वर को पकवान चढ़ाये जाते हैं और खुशहाली की कामना की जाती है. बेचन ने कहा कि जिस तरह से रांची में लोग एकजुट होकर बड़े पैमाने पर त्योहार मनाते हैं, उस तरह यहां पर अभी नहीं मना पाते हैं. पर प्रत्येक आदिवासी घरों में हम इसे उत्साह के साथ मनाते हैं.

बांग्लादेश में सादगी से मनेगा सरहुल

बेचन उरांव ने कहा कि बांग्लादेश में भी लगभग छह लाख आदिवासी समुदाय के लोग हैं. पर वहां जब से सरकार बदली है अल्पसंख्यक समुदायों के बीच भय का माहौल है. पिछले साल भी लोगों ने न तो करम मनाया और न ही खद्दी. सरना नवयुवक संघ रांची के अध्यक्ष डॉ हरि उरांव ने कहा कि पिछले साल से लोगों के बीच जो डर था वह अब भी खत्म नहीं हो पाया है. लोग खुलकर त्योहार नहीं मना पा रहे हैं. पश्चिम बंगाल में रहनेवाले सुशील उरांव के जरिये बांग्लादेश निवासी मलिन सरदार से बात हुई. मलिन के अनुसार बांग्लादेश में अब भी डर का माहौल है. एक अप्रैल को सरहुल पर्व मनायेंगे, लेकिन खुले रूप में नहीं. पिछले साल अल्पसंख्यकों के साथ मारपीट और धमकाने जैसी घटनाएं आम थी. उसका असर अभी भी है.

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